खेतीगेहूंफसलें

गेहूँ की उन्नत पैदावार के लिये खेती के वैज्ञानिक तौर तरीके

गेहूँ की उपज लगातार बढ रही है। यह वृध्दि गेहूँ की उन्नत किस्मों तथा वैज्ञानिक विधियों से हो रही है। यह बहुत ही आवश्यक है कि गेहूँ का उत्पादन बढाया जाय जो कि बढती हुई जनसंख्या के लिए आवश्यक है। गेहूँ की खेती पर काफी अनुसंधान हो रहा है और उन्नत किस्मों के लिए खेती की नई विधियां निकाली जा रही है। इसलिए यह बहुत ही आवश्यक है कि प्रत्येक किसान को गेहूँ की खेती की नई जानकारी मिलनी चाहिए जिससे वह गेहूँ की अधिक से अधिक उपज ले सके।

गेहूँ की अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिये निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है :

१. शुद्घ एवं प्रमाणित बीज की बुआई बीज शोधन के बाद की जाये।

२. प्रजाति का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता एवं समय विशेष के अनुसार किया जायें।

३. तीसरे वर्ष बीज अवश्य बदल दिये जायें।

४. संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर सही समय पर उचित विधि से किया जायें।

. क्रान्तिक अवस्थाओं (ताजमूल अवस्था एवं पुष्पावस्था) पर सिंचाई समय से उचित विधि एवं मात्रा में की जाय।

६. कीड़े एवं बीमारी से बचाव हेतु विशेष ध्यान दिया जाये।

. गेहूँसा के प्रकोप होने पर उसका नियंत्रण समय से किया जाये।

८. अन्य क्रियायें संस्तुति के आधार पर समय से पूरी कर ली जाये।

९. जीरोटिलेज एवं रेज्ड वेड विधि का प्रयोग किया जाये।

१०.खेत की तैयारी के लिए रोटवेटर हैरो का प्रयोग किया जाये।

११. जीवांश खादों का प्रयोग किया जाये।

१२. यथा सम्भव आधी खादों की मात्रा जीवांश खादों से की जाये।

सघन विधियां:

(अ) सिंचित बुवाई की दशा में:

प्रदेश में कुल  गेहूँ का लगभग ९७ प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है किन्तु थोड़े  क्षेत्र में आश्वस्त अथवा सुनिश्चित सिंचाई उपलब्ध है। अतः सिंचाई तथा उर्वरक के सीमित साधनों से हम किस प्रकार गेहूँ की उपज बढ़ा सकते है। इसे भली प्रकार समझकर उन्नतिशील प्रजातियों का चयन कर उसका उपयोग करना चाहियें।

खेत की तैयारी:

गेहूँ की बुवाई अधिकतर धान की बाद की जाती है। अतः गेहूँ की बुवाई में बहुधा देर हो जाती है। हमे पहले से यह निश्चित कर लेना होगा कि खरीफ में धान की कौन सी प्रजाति का चयन करें और रबी में उसके बाद गेहूँ की कौन सी प्रजाति बोये। गेहूँ की अच्द्दी उपज प्राप्त करने के लिए धान की समय से रोपाई आवश्यक है जिससे गेहूँ के लिए अक्टूबर माह में खाली हो जायें। दूसरी बात ध्यान देने योग्य यह कि धान में पडलिंग/लेवा के कारण भूमि कठोर हो जाती है। अतः भूमि में पहले मिट्‌टी पलटने वाले हल से जुताई के बाद डिस्क हैरो से दो बार जुताई करके मिट्‌टी को भुरभुरी बनाकर ही गेहूँ की बुवाई करना उचित होगा। डिस्क हैरो के प्रयोग से धान के ठूंठ द्दोटे-द्दोटे टुकड़ों मे कट जाते है। इन्हे शीध्र सड़ाने हेतु १५-२० किग्रा० नत्रजन (यूरिया के रूप में) प्रति हेक्टर खेत को तैयार करते समय पहली जुताई पर अवश्य दे देना चाहियें। ट्रैक्टर चालित रोटावेटर द्वारा एक ही जुताई में खेत पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है।

(ब) सिंचित तथा विलम्ब से बुवाई की दशा में:

गेहूँ की बुवाई अगहनी धान, तोरिया, आलू, गन्ना की पेड़ी एवं शीध्र पकने वाली अरहर के बाद की जाती है। किन्तु कृषि अनुसंधान की विकसित निम्न तकनीकी द्वारा इन क्षेत्रों की भी ऊपज बहुत कुछ बढाई जा सकती है –

१. पिद्देती बुवाई के लिए क्षेत्रीय अनुकूलतानुसार प्रजातियों का चयन करें जिनका वर्णन पहले किया जा चुका है।

२. बिलम्ब की दशा में बुवाई जीरो ट्रिलेज मशीन से करें |

३. बीज दर १२५ किग्रा० प्रति हेक्टेयर एवं संतुलित मात्रा में उर्वरक (८० : ४० : ३०) अवश्य प्रयोग करें।

४. बीज को रातभर पानी मे भिगोकर २४ घन्टे रखकर जमाव करके उचित मृदा नमी पर बोंयें।

५.  पिद्देती गेहूँ मे सामान्य की अपेक्षा जल्दी-जल्दी सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। पहली सिचांई जमाव के १५-२० दिन बाद करके टापड्रेसिंग करें। बाद की सिचांई १५ से २० दिन के अन्तराल पर करें। बाली के १५-२० दिन बाद करके टापड्रेसिंग करें। बाद की सिचांई १५-२० दिन के अन्तराल पर करे। बाली निकलने से दुग्धावस्था तक फसल को जल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहे। इस अवधि में जल की कमी का उपज पर विशेष कुप्रभाव पड़ता है। सिचाई हल्की करें। अन्य शस्य क्रियाएं सिंचित गेहूँ की भॉति अपनायें।

(स) असिंचित अथवा बरनी दशा में गेहू की खेती:

प्रदेश में गेहूँ की लगभग १० प्रतिशत क्षेत्र असिंचित है जिसकी औसत ऊपज बहुत कम हैं | इसी क्षेत्र की औसत ऊपज प्रदेश की औसत ऊपज को कम कर देती है | परीक्षणों से ज्ञात  हुआ है कि बरानी दशा मैं गेहूँ कि अपेज्ञा राई, जौ तथा चना की खेती अधिक लाभकारी  हैं, ऐसी दशा में गेहूँ की बुवाई अक्तूबर माह में उचित नमी पर करें | लेकिन यदि अक्टूबर या नवम्बर में पर्याप्त वर्षा हो गयी  हो तो गेहू की बरानी खेती निम्नवत विशेष तकनिकी  अपनाकर की जा सकती हैं |

खेत की तैयारी तथा नमी संरक्षण:

मानसून की अन्तिम वर्षा का यथोचित जलसंरक्षण करके खेत की तैयारी करें| सिंचित क्षेत्रों में अधिक जुताई की आवश्यकता नही है, अन्यथा नमी उड़ने का भय रहता है, ऐसे क्षेत्रों में सायंकाल जुताई करके दुसरे दिन प्रात: काल पाटा लगाने से नमी का समुचित संरक्षण किया जा सकता हैं |

बुवाई:

गेहूँ की बुवाई समय से एवं पर्याप्त नमी पर करना चाहिए। देर से पकने वाली प्रजातियों की बुवाई समय से अवश्य कर देना चाहिए। अन्यथा उपज में कमी हो जाती है जैसे-जैसे बुवाई में विलम्ब होता जाता है गेहूँ की पैदावार में गिरावट की दर बढ़ती चली जाती है। दिसम्बर में बुवाई करने पर गेहूँ की पैदावार ३ से ४ कु०/हे० एवं जनवरी में बुवाई करने पर ४ से ५ कु०/हे० प्रति सप्ताह की दर से घटती है। गेहूँ की बुवाई सीडड्रिल से करनी चाहिए।

बीज दर एवं बीज शोधन:

लाइन में बुवाई करने पर सामान्य दशा में १०० किग्रा तथा मोटा दाना १२५ किग्रा० प्रति है० तथा द्दिटकवॉ बुवाई की दशा में सामान्य दाना १२५ किग्रा० व मोटा दाना १५० किग्रा० प्रति हे० की दर से प्रयोग करना चाहियें। बुवाई से पहले जमाव प्रतिशत अवश्य देख ले। राजकीय अनुसंधान केन्द्रो पर यह सुविधा निःशुल्क उपलब्ध है। यदि बीज अंकुरण क्षमता कम होतो उसी के अनुसार बीज दर बढ़ा ले तथा बीज प्रमाणित न होतो उसका शोधन अवश्य करे। बीजो का कर्बाक्सिल, एजेतोबैक्टर  व पी. एस. वी.से उपचारित कर बोवाई करें| सिमित सिचाई वाले क्षेत्रों में रेज्ड वेड विधि से बुवाई करने पर सामान्य दशा में ७५ किग्रा० तथा मोटा दाना १०० किग्रा० प्रति हे.की दर से प्रयोग करे।

पंक्तियों की दूरी:सामान्य दशा में १८ सेमी० से २३ सेमी० एवं गहराई ५ सेमी०।

विलम्ब से बुवाई की दशा मे: १५ सेमी० से १८ सेमी० तथा गहराई ४ सेमी०।

विधि:

बुवाई हल के पीद्दे कुड़ो में या फर्टी सीड ड्रिल द्वारा भूमि की उचित नमी पर करें। पलेवा करके ही बोना श्रेयस्कर होता है। यह ध्यान रहे कि कि कल्ले निकलने बाद प्रति वर्गमीटर ४०० से ५०० बालीयुक्त पौधे अवश्य हों अन्यथा इसका उपज पर कुप्रभाव पड़ेगा। विलम्ब से बचने के लिये पन्तनगर जीरोट्रिल बीज व खाद ड्रिल से बुवाई करें। ट्रैक्टर चालित रोटो टिल ड्रिल द्वारा बुवाई अधिक लाभदायक है। बुन्देलखण्ड (भावर एवं कावर मृदा) मृदा मैं बिना जुताई के बुवाई कर दिया जाय ताकि जमाव सही हो|

समय से बुवाई:
संस्तुत प्रजातियों की बुवाई अक्तूबर के प्रथम पक्ष से द्वितीय पक्ष तक भूमि की उपयुक्त नमी पर करें |
बीज दर एवं पक्तियों से दूरी:
बीज का प्रयोग १०० किलोग्राम प्रति हे. की दर से करें और बीज को कुड़ो में २३ सेमी. की दूरी पर बोयें जिससे बीज के ऊपर ४-५ सेमी. से अधिक मिट्टी न हो |

उर्वरकों का प्रयोग:

(क) मात्रा

उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना उचित है। बौने गेहूँ की अच्द्दी उपज के लिए मक्का धान, ज्वार, बाजरा, की खरीफ फसलों के बाद भूमि में १५०:६०:४० किग्रा० प्रति हेक्टेयर की दर से तथा विलम्ब से ८०:४०:३० क्रमशः नत्रजन फास्फोरस तथा पोटाश का प्रयोग करना चाहिए बुन्देलखण्ड क्षेत्र में सामान्य दशा में १२०:६०:४० किग्रा. नत्रजन, फास्फोरस तथा पोटाश एवं ३० किग्रा० गंधक प्रति हे, की दर से प्रयोग करना लाभदायक रहेगा।जिन क्षेत्रों में डी. ए. पी. का प्रयोग लगातार किया जा रहा हो उनमें ३ किग्रा. गन्धक का प्रयोग लाभदायक रहेगा| यदि खरीफ में खेत परती रहा हों या दलहनी फसलें बोई गई हों तों नत्रजन की मात्रा २० किग्रा० प्रति हेक्टर तक कम प्रयोग करें। अच्द्दी उपज के लिये ६० कुन्तल प्रति हे० गोबर की खाद का प्रयोग करें। यह भूमिकी उपजाऊ शक्ति को बनायें रखने मेंमदद करती है।

लगातार धान-गेहूँ फसल चक्र वाले क्षेत्रों में कुद्द वर्षो बाद गेहूँ की पैदावार में कमी लगती है। अतः ऐसे क्षेत्रों में निम्न विधि अपनाएं। गेहूँ की फसल कटने के बाद तथा धान की रोपाई के बीच हरी खाद का प्रयोग करें अथवा धान की फसल में १०-१२ टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद का प्रयोग करें। अब भूमि में जिंक की कमी प्रायः देखने में आ रही है। गेहूँ की बुवाई के २०-३० दिन के मध्य में पहली सिंचाई के आस-पास पौधों में जिंक की कमी के लक्षण प्रकट होते हे। जो निम्न है-

. प्रभावित पौधे स्वस्थ पौधों की तुलना में बौने रह जाते है।

२. तीन चार पत्ती नीचे से पत्तियों के आधार पर पीला पन शुरू होकर ऊपर की तरफ बढ़ता है।

३. आगे चलकर पत्तियों पर कत्थई रंग के धब्बे दिखतें है।

खड़ी फसल में यदि जिक की कमी हो तो उपयुक्त लक्षण दिखाई दे तो ५ किग्रा० जिंक सल्फेट का तथा १६ किग्रा० यूरिया को ८०० लीटर पानी में घोलकर प्रति हे० की दर से द्दिड़के। यदि यूरिया की टापड्रेसिंग की जा चुकी है तो यूरिया के स्थान पर २.५ किग्रा० बुझे हुए चूने के पानी (२.५ किग्रा० बुझे हुए चूने को १० लीटर पानी में सांयकाल डाल देवे तथा दूसरे दिन प्रातः काल इस पानी को निथार कर प्रयोग करें और चूना फेंक दें) ध्यान रखें कि जिंक सल्फेट के साथ यूरिया अथवा बुझे हुए चूने के पानी को मिलना अनिवार्य है। धान के खेत में यदि जिंक सल्फेट का प्रयोग बेसल ड्रेसिंग के रूप में न किया गया हो और कमी होने की आशंका होतो २०-२५ किग्रा०/हे० जिंक सल्फेट की टाप ड्रेंसिंग करें।

(ख़) समय व विधि:

उर्वरकीय क्षमता बढ़ाने के लिए उनका प्रयोग विभिन्न प्रकार की भूमियों में निम्न प्रकार से किया जायें।

१. दोमट या मटियार , कावर तथा मार: 

नत्रजन की आधी फास्फेट व पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय कूड़ो में बीज के २-३ सेमी० नीचे दी जावे। नत्रजन की शेष मात्रा पहली सिंचाई के २४ घण्टे पहले या ओट आने पर दे।

२. बलुई दोमट राकड व पडवा बलुई जमीन में नत्रजन की १/३ मात्रा फास्फेट तथा पोटाश की पूरी मात्रा को बुवाइ र् के समय कूड़ो में बीज के नीचे देना चाहियें। शेष नत्रजन एवं पोटाश की आधी मात्रा पहली सिंचाई (२०-२५ दिन) के बाद(क्राउन रूट अवस्था) तथा बची हुई मात्रा दूसरी सिचाई के बाद ही करना अधिक लाभप्रद होता है। जो केवल ४० किग्रा० नत्रजन तथा दो सिंचाई देने में सक्षम हो वह भारी दोमट भूमि में सारी नत्रजन बुवाई के समय प्लेसमेन्ट कर दे किन्तु जहॉ हल्की दोमट भूमि हो वहॉ नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के समय (प्लेसमेन्ट) कूंडों में प्रयोग करें और शेष आदि पहली सिंचाई पर टापड्रेसिंग करें।

उर्वरक की मात्र एवं प्रयोग बिधि :
बरानी गेहूँ की खेती के लिए ४० किग्रा. नत्रजन , ३० किग्रा. फास्फोरस, तथा ३० किग्रा. पोटाश प्रति हे. की दर से प्रयोग करें | उर्वरक की यह संम्पूर्ण मात्रा बुवाई के समय कुंदो में बीज के २-३ सेमी.  नीचे नाई अथवा चोंगे द्वारा डालना चाहिए | बालीनिकलने से पूर्व वर्षा हो जाने पर १५-२० किग्रा. /हे. नत्रजन का प्रयोग लाभदायक होगा यदि वर्षा न हो तो २ प्रतिशत यूरिया का पर्णीय छिड़काव किया जाय |

आश्वस्त सिंचाई की दशा में:

सामान्तः बौने गेहूँ की अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिए हल्की भूमि में सिंचाइयॉ निम्न अवस्थाओं में करनी चाहियें। इन अवस्थाओं पर जल की कमी का उपज पर भारी कुप्रभाव पड़ता है। परन्तु सिंचाई हल्की करे।

१. पहली सिंचाई: क्राउन रूट- बुवाई के २०-२५ दिन बाद (ताजमूल अवस्था)

२. द्दूसरी सिंचाईः बुवाई के ४०-४५ दिन पर (कल्ले निकलते समय)

३. तीसरी सिंचाईः बुवाई कें ६०-६५ दिन पर (दीर्घ सन्धि अथवा गांठे बनते समय)

४. चौथी सिंचाई: बुवाई के ८०-८५ दिन पर (पुष्पावस्था)

५. पॉचवी सिंचाई: बुवाई के १००-१०५ दिन पर (दुब्धावस्था)

६. द्दठी सिंचाई: बुवाई के ११५-१२० दिन पर (दाना भरते समय)

दोमट या भारी में निम्न चार सिंचाईयॉ करके भी अच्द्दी उपज प्राप्त की जा सकती है परन्तु प्रत्येक सिंचाई कुद्द गहरी (८ सेमी०) करें।

१. पहली सिचाई बोने के २०-२५ दिन बाद।

२. दूसरी सिंचाई पहली के ३० दिन बाद।

३. तीसरी सिंचाई दूसरी के ३० दिन बाद।

४. चौथी सिंचाई तीसरी के २०-२५ दिन बाद।

सीमित सिंचाई साधन की दशा में:

यदि तीन सिंचाइयों की सुविधा ही उपलब्ध होतो क्राउन रूट वाली निकलने के पूर्व तथा दुग्धावस्था पर करें। यदि दो सिचाइयों की उपलब्ध हो तो क्राउन रूट एवं पुष्पावस्था पर करें। यदि एक सिचाई उपलब्ध होतो क्राउन रूट अवस्था पर करें। गेहूँ की सिंचाई में निम्नलिखित ३ बातो पर ध्यान दे।

१. बुवाई से पहले खेत भली-भाति सममतल करें तथा किसी एक दिशा में हल्का ढ़ाल दें जिससे जल का पूरे खेत में एक सर वितरण हो सकें।

२. बुवाई के बाद खेत को मृदा तथा सिचाई के साधन के अनुसार आवश्यक माप की क्यारियों अथवा पटि्‌टयों में बांट दे। इससे जल के एक सार वितरण में सहायता मिलती है।

३. हल्की भूमि में आश्वस्त सिंचाई सुविधा होने पर सिचाई हल्की (लगभग ६ सेमी० जल) तथा दोमट  व भारी भूमि में तथा सिंचाई साधन की दशा में सिचाई कुद्द गहरी (प्रति सिचाई लगभग ८ सेमी० जल) करें।

नोट : ऊसर भूमि में पहली सिचाई बुवाई के २८-३० दिन बाद तथा शेष सिचाईयां हल्की एवं जल्दी-जल्दी करनी चाहियें। जिससे मिट्‌टी सूखने न पायें।

खरपतवार नियंत्रण:

गेहूँ की फसल में रबी ऋतु के लगभग सभी खरपतवार जैसे गजरी बथुआ प्याजी खरतुआ हिरनखुरी, चटरी-मटरी जंगली गाजर, सेजी, अकरा, अकरी, कृष्णनील, गेहूसा, तथा जंगली जई आदि की समस्या रहती है। जिनकी रोकथाम निकाई के अतिरिक्त निम्नलिखित खरपतवार नाशक रसायनों द्वारा भी की जा सकती है।

खरपतवार का नाम:

१. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार जैसे बथुआ आरजीमोन (सत्यानाशी) हिरनखुरी, कृष्णनील गजरी, प्याजी आदि।

खरपतवार नाशी का नाम :

२-४ डी सोडियम साल्ट ८० प्रतिशत डब्लू०पी० मात्रा प्रति हेक्टेयर ६२५ ग्राम |

प्रयोग करने का समय एवं विधि।:

बुवाई के ३५-४० दिन के अन्दर फकैटफैन नाजिल से ८०० से १००० लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हे० की दर से प्रयोग करना चाहियें। सकरी पत्ती जैसे गेहूँसा व जंगली जई के नियंत्रण हेतु निम्न लिखित रसायनों का प्रयोग करना चाहियें।

१. आइसोप्रोट्यूरान ५० प्रतिशत, मात्रा प्रति हेक्टेयर १.५ किग्रा. अथवा
२.आइसोप्रोट्यूरान ७५ प्रतिशत, मात्रा प्रति हेक्टेयर १.०० किग्रा. अथवा
३. पैंडीमैथिलींन ३० ई. सी. मात्रा प्रति हेक्टेयर ३.३० लीटर अथवा
४.सल्फो सल्फयूरान ७५  डब्लू . जी. मात्रा प्रति हेक्टेयर ३३ ग्राम अथवा ३२ मिली. प्रति हेक्टेयर
५.फिनाक्सी प्राप१० ई. सी. मात्रा प्रति हेक्टेयर १.०० लीटर |
६. सल्फो सल्फयूरान + मेटा सल्फयूरान ४० ग्राम प्रति हेक्टेयर |
प्रयोग करने की बिधि एवं समय :
पहली सिचाई के एक सप्ताह बाद बुवाई के ३०-३५ दिन के भीतर फ़्लैटफैन नाजिल से ८००- १००० लिटरे पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए | जहाँ चौड़ी पत्ती वाले और सकरी पत्ती वाले दोनों है वहां सल्फो सल्फयूरान ७५ प्रतिशत (३२ मिली./हे.) मेट सल्फयूरान मिथाइल ५ ग्राम डब्लू. जी. ४० ग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा की  बुवाई ३०-३५ दिन बाद छिड़काव२,४ डी. तथा आइसोप्रोटयूरान मिलाकर प्रयोग किया जा सकता है |
पैडीमिथिलिन का प्रयोग बुवाई के बाद किन्तु जमाव से पहले किया जाय| इन खरपतवारों को फसल चक्र में परिवर्तन करके  भी कम किया जा सकता है | जहां पर आइसोप्रोटयूरान प्रभावी नहीं है वहीँ पर क्रम संख्या ३,४ व ५ पर अंकित रसायन का प्रयोग करें |
खड़ी फसल में रोग एवं चूहे का उपचार:
खड़ी फसल पर कभी-कभी बुत से रोग जैसे अल्टरनेरिया, ब्लाइट, गेरुई या रतुआ का प्रकोप हो जाता है, जिससे फसल को भरी क्षति हो जाती है इसके अतरिक्त इस फसल को चूहे से भी भरी  क्षति होती हो जाती है, अत: आवश्यकतानुसार इसकी रोकथाम निम्निखित अलग-अलग बिधियों से करनी चाहिए |

(१) झुलसा रोग की पहचान :
कुछ पीले व कुछ भूरापन लिए हुए अण्डाकार  धब्बे शुरू में में निचली पत्तियों पर दिखाई देते है | ये धब्बे बाद में किनारों पर कत्थई भूरे रंग के हो जाते है |
उपचार :
इनकी रोकथाम हेतु निम्न में से किसी एक का छिड़काव प्रति हे. की दर से करें |
१. मैकोजेब ५ किग्रा/हे.
२. जिनेब७५ प्रतिशत घुलनशील चूर्ण २.५ किग्रा.
३. थीरम ८० प्रतिशत घुलनशील चूर्ण २.० किग्रा. अथवा जीराम २७ प्रतिशत ३.५ लीटर दुसरे छिड़काव के घोल में २० किग्रा. यूरिया / प्रति हेक्टेयर में मिलायें|
४. प्रोपिकोनोजोल (२५ प्रतिशत ई. सी.) को आधा लीटररसायन को १००० लीटर पानी में छिड़काव करें |

(२) गेरुई अथवा रतुआ रोग की पहचान :
गेरुई भूरे पीले अथवा कालर रंग की होती है | क्षेत्र में फसल प्राय: भूरे रतुआ से ही प्रभवित होती है | फफूदी के फफोले पत्तियों पर पद जाते है जो बाद मैं बिखर कर अन्य पत्तियों को ग्रसित कर देते हैं | काली गेरुई तना तथा पत्ती दोनों पर लगती हैं |
उपचार:
गेहूँ की फसल में गेरुई रोगों के नियंत्रण के लिए मुख्यत: आर्थिक कारणों कवकनाशी के छिड़काव की आम संस्तुति नही की जाती है | केवल उन परिस्थितियों में जिनमे गेहूँ की पैदावार कम से कम २५-३० कुंतल प्रति हेक्टेयर होने व गेरुई का प्रकोप होने की प्रबल सम्भावनामें मैकोजेब २.० किग्रा. या जिनेब २.५ किग्रा. प्रति हेक्टेयर का छिड़काव  किया जा सकता है | पहला छिड़काव रोग दिखाई देते ही तथा दूसरा छिड़काव १० दिन के अंतर पर करना चाहिए | एक साथ झुलसा, रतुआ तथा करनाल बंटतीनो रोगों की असंका होने पर प्रोपीकोनेजोल (२५ प्रतिशत ई. सी.) आधा लीटर रसायन को १००० लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करे |

चूहे:
गेहूँ की खड़ी फसल को चूहे बहुत अधिक नुकसान पहुचाते हैं, अतः फसल की अवधि में दो तीन बार इनकी  रोकथाम की आवश्यकता है | यदि चूहों की रोकथाम का कार्य समोहिक रूप से किया जाय तो अधिक सफलता मिलती है
उपचार:
इनकी रोकथाम हेतु जिंक फास्फाइड अथवा बेरियम कार्बोनेट में बने जहरीले चारे का प्रयोग करें |

जहरीला चारा बनाने की विधि:

१. जिंक फास्फाइड एक भाग सरसों का तेल एक भाग तथा ४५ भाग दाना अथवा बेरियम कार्बोनेट-१०० ग्राम गेहूॅ का आंटा ८६० ग्राम शक्कर १५ ग्राम तथा २५ ग्राम सरसों का तेल मिलाकर बनाया हुआ जहरीला चारा प्रयोग करें |

 

मुख्य बिन्दु:

१. समय से बुवाई करें।

२. क्षेत्र विशेष के लिए संस्तुत प्रजाति का चयन करके शुद्घ एवं प्रमाणित शोधित बीज का ही प्रयोग करें।

३. मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित मात्रा मं उर्वरकों का प्रयोग किया जाय। बोते समय उचित मात्रा में उर्वरक का प्रयोग अवश्य करें।

४. सिचन क्षमता का भरपूर उपयोग करते हुए संस्तुति अनुसार सिंचाइयॉ करें।

५. यदि पूर्व फसल में या बुवाई के समय जिंक प्रयोग न किया गया हो तो जिंक सल्फेट का प्रयोग खड़ी फसल में संस्तुति के अनुसार किया जाय |
६. खरपतवारों के नियंत्रण हेतु रसायनों को संस्तुति अनुसार सामयिक प्रयोग करें |
७. रोगों एवं कीड़ों पर समय से नियंत्रण किया जाये |

एकीकृत  प्रबन्धन:
१. पूर्व मिएँ बोई गयी फसलों के अवशेषों को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए |
२. हो सके तो दिमकौलोको खोदकर रानी दीमक को मार दें |
३. दीमक प्रकोपित क्षेत्रों में नीम की खली १० कु. /हे. की दर से प्रयोग कारन चाहिए |
४. दीमक ग्रसित क्षेत्रों में क्लोरोपारीफांस२० ई. सी. ४ मिली. या इन्डोसल्फान ३५ ई. सी. ७.० मिली . प्रति किग्रा. की दर से बिज सोधन के उपरांत ही बुवाई करें |
५. समय से बुवाई करने से माहू सैनिक कीट का प्रकोप कम होता है |
६. मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरको का प्र्रयुओग करें | अधिक न्त्र्जनित खादों के प्रयोग से माहू  एवं सैनिक कीट के प्रकोप बढ़ने की सम्भावना रहती है |
७. कीटो के प्राकृतिक शत्रुओं का संरक्षण करें |
८. खड़ी फसल में दिमलक का प्रकोप होने पर कलोरपाइरीफांस२० ई. सी. २-३ लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से सिचाई के पानी के साथ अथवा बालू में मिलाकर प्रयोग करें |
९. वेवेरिया वेसियानाका प्रयोग किया जाय |

गेहूं में फसल सुरक्षा:
बीज शोधन:
गेहूँ की फसल में दुर्गन्धयुक्त कण्डुआ, करनालबंट, अनावृत  कण्डुआ तथा सेहूँ रोगों का प्रारम्भिक संक्रमण बीज या भूमि अथवा दोनों माध्यम से होता है |रोग कारक फफूँदी, जीवाणु व सूत्र कृमि बीज की सतह पर सतह के नीचेया बीज के अन्दर, प्रसुप्ता अवस्था में मौजूद रहते हैं इसलिए जहाँ तालक सम्भव हो सोधित, उपचारित एवं प्रमाणित बीज हो बोना चाहिए| यदि सम्भव न हो तो निम्न उपाय अपनाये |

गेहूँ की फसल में एकीकृत रोग प्रबंधन:
प्रमुख रोग:

(१) काली गेरुई
(२) भूरी गेरुई
(३) पीली गेरुई
(४) करनाल बंट
(५) अनावृत कण्डुआ (६) सेहूँ
(७) स्पाट ब्लाच
(८) काली गेरुई
अपनाई जाने वाली प्रमुख क्रियाएं: 
मृदा उपचार:

बुवाई से पूर्व जैव कवकनाशी (ट्राईकोडरमा प्रजाति आधारित) के द्वारा २.५ किग्रा प्रति हे, की ६० किलो गोबर की खाद में मिलाकरमृदा उपचार करें जिससे अनाबृत कण्डुआ, करनालबंट आदिरोगों के प्रबंधन में सहायता मिलती है |
बीज उपचार:
जैव कवकनाशी (ट्राईकोडरमा प्रजाति आधारित)के द्वारा ४.० किग्रा. प्रति या कार्बोक्सिन (२ ग्राम/किग्रा.) की दर से बीजोपचार करना चाहिए | जिससे बीज जनित रोंगों (अनावृत कण्डुआ, करनाल बंट आदि) की रोक थाम  हो जाएगी | यदि मृदा उपचार जैव कवकनाशी से नहीं किया गया हो तो कार्बोक्सिन का प्रयोग संस्तुत दर पर किया जा सकता है |  अनावृत कण्डुआ से ग्रसित पौधों को उखाड़कर मिट्टी में दबा दें |
पर्णीय उपचार:
१. रतुआ (पीला, भूरा, काला) तथा झुलसा रोग के प्रबंध हेतु मैकोजेब का २ छिड़काव २.० से २.५ ग्राम/ लीटर दर से करना लाभदायक होता है | एक हेक्टेयर हेतु १००० लीटर पानी का प्रयोग करना चाहिए |
२. चूर्णिल आसिता रोग के लिए गंधक चूर्ण कवकनाशी का प्रयोग २ ग्राम/प्रति लीटर पानी की दर से करना चिहिए| रोग की पहचान होते ही दवा का प्रोग लाभदायक होता है |
३. करनाल बंट तथा स्पाट ब्लाच रोगों के लिए प्रोपिकोनाजोल का ०.५ मिली./ लीटर पानी की दर से छिड़काव पुष्पन की अवस्था से पाले लाभदायक रहता है |

गेहूँ के प्रमुख कीट:
दीमक:

यह एक सामाजिक कीट है तथा कालोनी बनाकर रहते हैं | एक कालोनी में अनेको श्रमिक (९० प्रतिशत) एवं सैनिक (२-३ प्रतिशत), एक रानी, एअक राजा तथा अनेको कालोनी बनाने वाले या पूरक अविकसित नर एवं मादा पाए जाते है | श्रमिक पंख हीन सबसे छोटे, पिताभि श्वेत रंग के होते हैं तथा यह कालोनी के लिए सभी कार्य करते हैं और हमारी फसल एवं अन्य वस्तुओं को हानि करने के लिए उत्तरदायी होते हैं |
माहूँ:
यह पंख हीन अथवा पंखयुक्त, हरे तथा चुभने एवं चूसने  वाले छोटे कीट होते हैं इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ पत्तियों बालियों से रस चूसते हैं तथा गुदा द्वारा मधु स्राव भी करते हैं | पत्तियों पर गिरे मधुस्राव काले कवक के उगने के कारण प्रकाश संष्लेश्ण की क्रिया में बाधा पड़ती है |

सैनिक कीट:
पूर्ण विकसित सूंडी लगभग ४० दिन मिमी. लम्बी गहरे बादामी रंग की होती है | इसके शरीर के पृष्ठ भाग पर दो लम्बी हल्की पीली बादामी आगे से पीछे की ओर द्धारियां पाई जाती हैं | यह भुखर एवं रात्रि  चर होती है सूंडी का जीवन लगभग तीन सपताह का होता है | यह गेहू की पत्तियों को खाकर हानि पहुचाती हैं | 
गुलाबी तना बेधक:
अंडो से निकलने वाले सुडी भूरे गुलाबी रंग की लगभग ५ मिमी. लम्बी होती है | यह ३-४ सप्ताह मैं पूर्ण विकसित होकर ताने के अन्दर ही प्यूपा में बदल जाती है | इस कीट की सूंडी के कटाने के फलस्वरूप फसल की बन्स्पतिक अवस्था में मृत गोभ तथा बाल आने पर सफेद बाल बनती है |  मृत गोभ अथवा सफेद बाल खीचने पर अस्सानी से बाहर नकल आती हैं|

आर्थिक क्षति स्तर :

    कीट का नाम       फसल की अवस्था   आर्थिक क्षति स्तर   
                                                सैनिक कीट                            बनास्पतिक अवस्था  ४-५ सूंडी प्रति मीटर कतार
माहू बाली निकलने की अवस्था ५ प्रति बाली
गुलाबी तना बेधक  बनास्पतिक अवस्था  ५ प्रतिशत प्रकोपित तना

 

कटाई-मड़ाई:

बालियों के पक जाने (भौतिक परिपक्वता) पर फसल को तुरन्त काट लेना चाहिए अन्यथा दाने झड़ने की साम्भावना। खराब मौसम की दशा में कम्बाईड हार्वेस्टर का प्रयोग श्रेयस्कर है जिससे हानियों से बचा जा सकता है।

 

विशेष बिंदु:
अनाज को धातु की बनी बखारियों अथवा कोठियों या कमरे मई जैसी सुबिधा है | भण्डारण के पूर्व कोठिलो तथा कमरे को साफ़ कर लें और दिवालो तथा फर्श पर मैलाथियान ५० प्रतिशत के घोल (१:१००) को ३ लीटर प्रति १०० वर्गमीटर की दर से छिडके |बुखारी क्र ढक्कन पर पालीथीन लगाकर मिटटी का लेप कर दें जिससे वायुरोधी हो जाये |

 

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