कीट खर-पतवार और रोग नियंत्रणकृषि प्रबंधनखेतीधानफसलेंरोग प्रबंधन

धान की फ़सल में विभिन्न प्रकार के कीट और रोग प्रबंधन के तरीके

मुख्य रोगउपरहार असिचिंत परिस्थितिगहरे पानी वाली परिस्थिति 
सफेद रोग (नर्सरी में)भूरा धब्बाजीवाणु झुलसा
जीवाणु झुलसाशीथ झुलसाजीवाणु धारी
शीथ झुलसाझोकाशीथ झुलसा
भूरा धब्बाखैरा
जीवाणु धारी
झोका
खैरा

 

सफेद रोग :

पहचान :

यह रोग लौह तत्व की अनुपलब्धता के द्वारा नर्सरी में अधिक लगात है। नई पत्ती सफेद रंग की निकलेगी जो कागज के समान पडकर फट जाती है।

उपचार :

इसके उपचार के लिए प्रति हेक्टर ५ किग्रा० फेरस सल्फेट को २० किग्रा० यूरिया अथवा २.५० किग्रा० बुझे हुए चने को ८०० लीटर/हेक्टर पानी के साथ मिलाकर २-३ द्दिडकाव दिन के अन्तर पर करना चाहिये।

पत्तियों का भूरा धब्बा :

पहचान :

पत्तियों पर गहरे कत्थाई रंग के गोल अथवा अण्डाकार धब्बे पड़ जाते है। जिसका बीच का हिस्सा कुद्द पीलापन लिए हुए कत्थई रंग का होता है। इन धब्बो के चारो तरफ पीला सा घेराव बन जाता है। जो इस रांग का विशेष लक्षण है।

उपचार

1. बोने से पूर्व ३ ग्राम थीरम अथवा ४ ग्राम ट्राइकोडमा बिरिडी प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर लेना चाहियें।

2. खड़ी फसल पर जिंक मैगनीज कार्बामेट या जीरम ८० प्रतिशत का दो किलो अथवा जीरम २७ ई.सी. ३ ली० प्रति हे. की दर से द्दिडकाव करना चाहिये। अथवा

3. खड़ी फसल पर थायोफेनेट मिथाइल १.५ किग्रा. प्रति हे. की दर द्दिडकाव करना चाहिये।

जीवाणु झुलसा :

पहचान :

इसमे पत्तियों नोंक अथवा किनारे से एकदम सूखने लगती है। सूखे हुए किनारो अनियिमित एंव टेढे मेढे होते है।

उपचार

1. बोने से पूर्व बीजोपचार उपयुक्त विधि से करे।

2. रोग के लक्षण दिखाई देते ही यथा सम्भव खेत का पानी निकालकर १५ ग्राम स्ट्रप्टोसाएक्लीन व कॉपर आक्सीक्लोराइड का ५०० ग्राम प्रति हेक्टर की दर से द्दिडकाव करना चाहिये।

3. रोग लक्षण दिखाई देने पर नत्रजन की टापड्रेसिंग यदि बाकी है तो उसे रोक देना चाहिये।

शीथ झुलसा :

पहचान :

पत्र कंचुल पर अनियमित आकार के धब्बे बनते है। जिनका किनारा गहरा भूरा तथा बीच का भाग हल्के रंग का होता है। पत्तियों पर घेरेदार धब्बे बनते है।

उपचार

खड़ी फसल पर १.५ किग्रा थायोफिनेट मिथाइल या १ किग्रा० कार्बेन्डाजिम का प्रति हेक्टर की दर से ८०० लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार १० दिन के अंतर पर द्दिडकाव करना चाहियें

जीवाणु धारी रोग :

पहचान :

पत्तियों पर कत्थाई रंग की लम्बी लम्बी धारियां नसो के बीच में पड जाती है।

उपचार

झुलसा की भांति उपचार करे।

झोंका रोग :

पहचान :

पत्तियों पर आंख की आकृति के धब्बे बनते है। जो बीच में राख के रंग के तथा किनारों पर गहरे कत्थाई रंग के होते है। इनके अतिरिक्त बालियों डंठलों पुष्प शाखाओं एवं गाठो पर काले भूरे धब्बे बनते है।

उपचार

1. बोने के पूर्व बीजो को २.३ ग्रीम थीरम या १.२ ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करे।

2. खड़ी फसल पर निम्न में से किसी एक रसायन का द्दिडकाव करना चाहिये।

3. कार्बेन्डाजिम १ किग्रा. प्रति हेक्टर की दर से २-३ द्दिडकाव १०-१२ दिन के अंतराल पर करे।

खैरा रोग :

पहचान :

यह रोग जस्ते की कमी के कारण होता है। इसमें पत्तियॉ पीली पड जाती है। जिस पर बाद मे कत्थाई रंग के धब्बे पड जाते है।

उपचार

फसल पर ५ किग्रा. जिंक सल्फेट को २० किग्रा. यूरिया अथवा २.५ बुझे हुए चूने के ८०० लीटर पानी के साथ मिलाकर प्रति हेक्टर द्दिडकाव करना चाहियें।

धान की फसल में एकीकृत रोग प्रबन्ध:

धान के प्रमुख रोगो के प्रभावी प्रबन्ध लिये निम्न उपाये अपनायें जा सकते हैं 

गर्मी में गहरी जुताई एवं मेडो तथा खेत के आसपास के क्षेत्र को खरपतवार से यथा सम्भव मुक्त रखना चाहिये। (सभी बीमारियों)

समय पर रोग प्रतिरोध/सहिष्णु प्रजातियां के मानक बीजो की बुवाई करनी चाहिये। (सेमी बीमारियों)

बीज शोधन नर्सरी डालने से पहले क्षेत्र विशेष की समयानुसार बीजशोधन अवश्य कर लेना चाहिये।

जीवाणु झुलसा की समस्या वाले क्षेत्रों में २५ क्रि०गा्र० बीज के लिए ३८ ग्राम ई.एम.सी. तथा ४ ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन को ४५ लीटर पानी में रात भर भिगो दे। दूसरे दिन द्दाया में सुखाकर नर्सरी डाले।

अन्य क्षेत्रों में बीज को ३ ग्राम थाइरम/किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिये।

 तराई एवं पहाड़ी क्षेत्रो मे बीज को ३ ग्रा. थाइरस १.५ ग्रा० /कार्बेन्डाजिम १.५ मिश्रण से किलो बीज को उपचारित करना चाहिये।

नर्सरी, सीधी बुवाई अथवा रोपाई के बाद खैर रोग के लिए एक सुरक्षात्मक द्दिडकाव ५ कि०ग्र० जिक सल्फेट को २० किग्र्रा. यूरिया १००० ली० पानी में साथ मिलाकर प्रति हेक्टर की दर से हते बाद द्दिडकाव करना चाहिये।

रोगो के लक्षण दिखते ही नत्रजन की शेष टापड्रेसिंग रोककर रोग सहायेक परिस्थितियों के समाप्त होने के पर करना चहियें उर्वरकों को संतुलित प्रयोग कई रोगो की वृद्घि रोगो की को रोकता है। सफेद रोग के नियंत्रण हेतु आवश्यकता पडने पर ५ किग्रा० फेरस सल्फेट की २० किग्रा० यूरिया के साथ ८०० लीटर पानी में घोल कर द्दिडकाव करना चाहिये।

बड़े क्षेत्र में महामारी से वचने के लिए एकाधिक प्रजातियों को लगाना चाहिए।

भूमि शोधन २.५ किग्रा. / हे.  + फ्य्म 70 – 80 से करें यदि  भूमि शोधन रसायन  से नहीं हुआ है तो

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