कपासखेतीफसलें

भारत में कपास की उन्नत खेती और अधिक पैदावार लेने के तरीके

खरीफ की नकदी फसलों में कपास का महत्वपूर्ण स्थान है। कपास की अधिक पैदावार लेने के लिए उन्नत किस्मों को सही समय पर बोने, उपयुक्त खाद देने व समय पर पौध संरक्षण के उपाय अपनाने की ओर विशेष ध्यान देना चाहिये।


किस्में : हरियाणा के लिए 

अमरीकन कपास : एच एस-6, एच-1098,  एच-1117, एच-1226, एच-1098 (संशोधित), एच-1236, एच-1300

अमरीकन कपास की संकर किस्में : एच एच एच 223, एच एच एच 287

देसी कपास की उन्नत किस्में : एच डी-107, एच डी-123, एच डी-324, एच डी-432

देसी कपास की संकर किस्म : ए ए एच-1

किस्में : संकर एवं BT किस्म मध्य प्रदेश के लिए

  डी.सी.एच. 32, एच-8, जी कॉट हाई.10, बन्नी बी टी, डब्लूएचएच 09 बीटी, आरसीएच 2 बीटी, जेके एच-1, जे के एच 3


भूमि व खेत की तैयारी :

रेतीली, लूणी और सेम वाली भूमि को छोड़कर इसकी खेती सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है। जमीन अच्छी प्रकार से तैयार करने के लिए 3-4 जुताइयां पर्याप्त है । अधिक पैदावार लेने के लिये जुताई गहरी की जानी चाहिए । पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए। खेत की अच्छी तैयारी के लिये दो बार हैरो या कल्टीवेटर से भी जुताई करें तथा प्रत्येक जुताई के बाद खेत में पाटा लगायें।


बिजाई का समय: कपास की बिजाई 15 अप्रैल से जून के पहले सप्ताह तक की जा सकती है। परन्तु मई का पूरा महीना कपास की बिजाई के लिए सर्वोत्तम है। बी.टी. कपास की बिजाई का सर्वोत्तम समय अप्रैल के तीसरे सप्ताह से लेकर मई के अंत तक है।


बीज मात्रा : सामान्यतः उन्नत जातियों का 2.5 से 3.0 किग्रा. बीज (रेशाविहीन/डिलिन्टेड) तथा संकर एवं बीटी जातियों का 1.0 किग्रा. बीज (रेशाविहीन) प्रति हेक्टेयर की बुवाई के लिए उपयुक्त होता हैं।


बीज का उपचार : बढ़िया परिणाम के लिये बिजाई से पहले बीज का निम्नलिखित दवाइयों से रोयें उतारे गये बीज का केवल 2 घण्टे तक ही उपचार करें : एमिसान 5 ग्राम, स्ट्रैप्टोसाईक्लिन 1 ग्राम, सक्सीनिक तेजाब 1 ग्राम, पानी 10 लीटर घोल में कपास के बीज डुबोकर उपचारित करें। जिन क्षेत्रों में दीमक की समस्या हो वहां उपर्युक्त उपचार के बाद बीज को थोड़ा सुखाकर 10 मि.ली. क्लोरपाईरीफास 20 ई.सी. व 10 मि.ली. पानी प्रति किलो बीज की दर से मिलाकर थोड़ा-थोड़ा बीज पर छिड़कें व अच्छी तरह मिलाएं तथा बाद में 30-40 मिनट बीज को छाया में सुखा कर बिजाई करें। जड़ गलन की समस्या वाले क्षेत्रों में पीछे बताए गये उपचार के पहले बीज का 2 ग्राम बाविस्टिन प्रति कि.ग्रा. बीज के हिसाब से सूखा उपचार करें यानि बीज को फफूंदनाशक घोल से निकाल कर कुछ समय तक छाया में सुखा कर बाद में उपचार करें। यह उपचार 40-50 दिन तक ही फसल को बचा सकता है।


बिजाई का तरीका : बीज को 4-5 सैं.मी. गहरा बोयें। कतार से कतार की दूरी 45-60 सैं.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 45-60 सैं.मी. रखें। संकर व बी.टी. कपास की बिजाई के लिए कतार से कतार की दूरी 90 सैं.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 90 सैं.मी. रखनी चाहिए (या) कतार से कतार की दूरी 120 सैं.मी. व पौधे से पौधे की दूरी 60 सैं.मी. रखनी चाहिए। मध्य प्रदेश में संकर एवं बीटी जातियों में कतार से कतार एवं पौधे से पौधे के बीच की दूरी क्रमशः 90 से 120 सेमी. एवं 60 से 90 सेमी रखी जाती हैं |


बी.टी. कपास में रिफ्यूजिया का महत्व : भारत सरकार की अनुवांषिक अभियांत्रिकी अनुमोदन समिति (जी. ई.ए.सी.) की अनुशंसा के अनुसार कुल बीटी क्षेत्र का 20 प्रतिशत अथवा 5 कतारें (जो भी अधिक हो) मुख्य फसल के चारों उसी किस्म का नान बीटी वाला बीज लगाना (रिफ्यूजिया) लगाना अत्यंत आवष्यक हैं प्रत्येक बीटी किस्म के साथ उसका नान बीटी (120 ग्राम बीज) या अरहर का बीज उसी पैकेट के साथ आता हैं। बीटी किस्म के पौधों में बेसिलस थुरेनजेसिस नामक जीवाणु का जीन समाहित रहता जो कि एक विषैला प्रोटीन उत्पन्न करता हैं इस कारण इनमें डेन्डू छेदक कीटों से बचाव की क्षमता विकसित होती हैं। रिफ्यूजिया कतारे लगाने पर डेन्डू छेदक कीटों का प्रकोप उन तक ही सीमित रहता हैं और यहाँ उनका नियंत्रण आसान होता हैं। यदि रिफ्यूजिया नहीं लगाते तो डेन्डू छेदक कीटों में प्रतिरोधकता विकसित हो सकती हैं ऐसी स्थिति में बीटी किस्मों की सार्थकता नहीं रह जावेगी ।


कतारों की दिशा : पूर्व से पश्चिम की दिशा में कतारों में बोई गई कपास उत्तर से दक्षिण दिशा में बोई गई कपास के मुकाबले अधिक पैदावार देती है। यह पैदावार बढ़ाने का एक अच्छा साधन है।


पौधों की छनाई करना : बिजाई के दो-तीन सप्ताह बाद कतारों में पौधों के अनुशंसित की गयी दूरी पर करें फालतू रोगग्रस्त/कीट प्रभावित व कमजोर पौधे हों उन्हें निकाल दें। एक जगह पर एक ही पौधा रखें। पौधों की छंटाई पहली सिंचाई से पहले पूरी कर लेनी चाहिए।


खाद एवं उर्वरक : यूरिया 150 किलोग्राम, सुपर फॉस्फेट 150 किलोग्राम, पोटाश 40 किलोग्राम और जिंक  सल्फेट 10 किलोग्राम  प्रति एकड़ का प्रयोग करना चाहिए। सारा फास्फोरस व जिंक सल्फेट बिजाई के समय डालें यूरिया की आधी मात्रा बौकी आने (जुलाई-अन्त) के समय तथा आधी फूल आने के समय डालें। यदि कपास, गेहूँ के बाद बोई गई है या कम उपजाऊ जमीन में बोई गई है तो नाइट्रोजन वाली खाद की पहली आधी मात्रा पौधों को बिरला करते समय देने की बजाय बिजाई पर दें। संकर व बी. टी. किस्मों के लिए नत्रजन खाद तीन बराबर हिस्सों में बांट कर तीन बार डालें- बिजाई के समय, बौकी आने पर तथा फूल आने पर।


यूरिया का पत्तों पर छिड़काव : उपर्युक्त नाइट्रोजन की मात्रा में से 8 किलो नाइट्रोजन प्रति एकड़ का यूरिया के रूप में छिड़काव लाभदायक रहता है। इसमें कीटनाशक दवाइयों को भी मिला लें और फसल में फूल व टिण्डे लगते समय छिड़काव करें। हाथ से चलने वाले पम्प में 2.5 प्रतिशत यूरिया का घोल होना चाहिए ।
पोटाशियम नाइट्रेट का छिड़काव : फसल में फूल आने पर एवं टिण्डे बनने के समय एक प्रतिशत पोटाशियम नाइट्रेट (2 किलोग्राम पोटाशियम नाइट्रेट व 200 लीटर पानी) का पत्तों पर छिड़काव करने से कपास की उत्पादकता तथा गुणवत्ता में वृद्धि होती है।


निराई तथा गुड़ाई : खरपतवार के नियन्त्रण के लिए दो-तीन बार निराई-गुड़ाई करनी चाहिए। पहली सिंचाई से पहले करें। बाद में हर सिंचाई या वर्षा के बाद  निराई-गुड़ाई  करें।


खरपतवार नियंत्रण : उगने से पहले स्टोम्प 30 (पैण्डीमिथालीन) का प्रयोग 2 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से करने पर खरपतवारों पर नियन्त्रण होता है।


सिंचाई : सिंचाई की क्रांतिक अवस्थाएँ :
1.सिम्पोडिया, शाखाएँ निकलने की अवस्था एवं 45-50 दिन फूल पुड़ी बनने की अवस्था।
2. फूल एवं फल बनने की अवस्था 75-85 दिन
3. अधिकतम घेटों की अवस्था 95-105 दिन
4. घेरे वृद्धि एवं खुलने की अवस्था 115-125दिन
कपास की फसल की वर्षा के हिसाब से 3 से 4 बार सिंचाई करने की आवश्यकता पड़ती है। पहली सिंचाई जितनी देर से की जाए अच्छी है परन्तु फसल को नुकसान नहीं होना चाहिए। शेष सिंचाइयां 2 या 3 सप्ताह के अन्तर पर करनी चाहिएं। फूल और फल आते समय सिंचाई के अभाव में फसल पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे फसल को बचाना चाहिए नहीं तो फल-फूल झड़ जायेंगे, जिससे उपज कम हो जायेगी। आखिरी सिंचाई एक-तिहाई टिण्डों के खुलते ही कर दें। इसके बाद कोई सिंचाई न करें।


चुनाई : अच्छा भाव प्राप्त करने के लिए साफ व सूखा कपास चुनें। अमेरिकन कपास अक्तूबर के महीने में चुनने के लिये तैयार हो जाती है। चुनाई 15-20 दिन के अन्तर पर करें। देसी कपास सितम्बर के तीसरे सप्ताह में चुनने के लिये तैयार हो जाती है। इसकी चुनाई 8-10 दिन के अन्तर पर करें। इससे क्षति कम होती है। कपास का सूखे गोदामों में भण्डारण करें।


हानिकारक कीड़े व हानि के लक्षण : 
हरियाणा में हरा तेला, सफेद मक्खी, चित्तीदार व गुलाबी सूण्डी कपास के मुख्य शत्रु कीड़े हैं परन्तु अनुकूल मौसम/परिस्थितियां मिलते ही अमेरिकन सूण्डी (चने की सूण्डी) भी कपास की प्रमुख शत्रु बन जाती है। पिछले 2-3 वर्षों से मीली बग ने भी एक प्रमुख कीड़े का रूप धारण कर लिया है। इनके अतिरिक्त रोयेंदार सूण्डियां (कातरा), चेपा, चूरड़ा, कुबड़ा कीड़ा, सतही टिड्डा, तम्बाकू सूण्डी, लाल व भूरे धूसर कीड़े एवं दीमक आदि पौधों के विभिन्न भागों को
समय-समय पर हानि पंहुचाते हैं।
1. दीमक छोटे व बड़े पौधों की जड़ों को काट-खाकर मई-जून तथा सितम्बर-अक्तूबर के महीनों में क्षति पहुंचाता है।
2. हरा तेला, चुरड़ा (थ्रिप्स) व सफेद मक्खी पत्तों से रस चूसकर पौधों की बढ़वार, गुणवत्ता तथा उपज को कम करते हैं। हरा तेला जुलाई-अगस्त में सर्वाधिक क्षति पहुंचाता है जबकि थ्रिप्स मई-जून में; सफेद मक्खी अगस्त-सितम्बर में तथा अल/चेपा (एफिड) सितम्बर-अक्तूबर में पत्तों से रस चूस कर हानि पहुंचाता है।
3. रोएंदार सूण्डी, कूबड़ा कीड़ा, तम्बाकू सूण्डी तथा सलेटी सुंडी पत्तों को खाकर हानि पहुंचाती हैं जबकि सतही टिड्डा नए अंकुरित पौधों पर आक्रमण करता है।
4. जुलाई से अक्तूबर तक चित्तीदार व गुलाबी सूण्डियां फलीय भागों (कलियां, फूल व टिण्डे) पर आक्रमण करती हैं। आरम्भ में चित्तीदार सूण्डियां टहनियों/कोपलों के ऊपरी भागों में छेद कर घुस जाती हैं तथा प्रभावित कोंपलें मुरझा कर लटक व सूख जाती हैं। फल आने पर चित्तीदार व गुलाबी सूण्डियां अण्डों में से निकलने के तुरन्त बाद कलियों व बन रहे टिण्डों में घुस जाती है तथा अन्दर ही अन्दर फूल के भागों, बन रहे बीजों व कपास को काटकर खाती रहती है। इन सूण्डियों के प्रभाव से तिफांकड़ी कलियां (चित्तीदार सूण्डी के आक्रमण से) व गुलाबनुमा फूल (गुलाबी सूण्डी के आक्रमण से) बनते हैं। प्रभावित फलीय भाग गिर जाते हैं तथा टिण्डे काने हो जाते हैं जो ठीक से नहीं खिलते। अगस्त के आखिर से मध्य-सितम्बर के दौरान अनुकूल मौसम, (भारी बरसात व बादल वाले मौसम तथा अधिकतम तापमान 30°.35° सैल्सियस) मिलने की अवस्था में अमेरिकन सूण्डी/चने की सूण्डी (हैलीकोवर्पा) भी कपास के फलीय भागों को भारी नुकसान पहुंचाती है। सितम्बर माह में रुक-रुक कर हल्की बरसात होने तथा तापमान अधिक रहने की अवस्था में सफेद मक्खी का प्रकोप बढ़ जाता है।
5. धूसर कीड़ों (कपास की लाल सुंडी तथा भूरे धूसर) के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों ही कपास के अधपके व बन रहे बीजों से रस चूसते हैं जिससे न केवल बीज की मात्रा एवं गुणवत्ता ही प्रभावित होती है बल्कि कपास से रूई व बिनौले अलग करते समय यह कीड़े साथ ही कुचले जाते हैं जिससे रूई पर धब्बे पड़ जाते हैं।
6. मीली बग एक बहुभक्षी कीड़ा है जो पौधों के विभिन्न भागों विशेषकर कोंपलों से समूह में एकत्र होकर रस चूसते हैं तथा प्रकोपित भाग को सुखा कर ही दम लेते हैं। मीली बग ग्रसित पौधों पर प्रायः काली अथवा भूरी चींटियां काफी संख्या में चलती नज़र आती हैं। इस कीड़े की अधिक संख्या बढ़ने पर पौधों पर दूर से ही रूई-सी नज़र आती है तथा नियंत्रण के अभाव में यह कीड़ा खेत में फैल कर पूरी फसल को सुखा सकता है। खरीफ मौसम के अनेक पौधे एवं खरपतवार जैसे कांग्रेस घास, सांठी, भाखड़ी, जंगली भ्रूट, पुठकण्डा (ऊँगा), होर्सवीड, अश्वगंधा, पलपोटन, कंघी बूटी, गुड़हल आदि इसके पनपने में सहायक हैं। कपास के अलावा यह भिण्डी, बैंगन, ग्वार आदि को भी हानि पहुँचाता है। सर्दियों में यह कीड़ा कपास की छट्टियों के ढेरों में पनाह लेता है व कांग्रेस घास, अश्वगंधा व होर्सवीड पर जीवनयापन करता है। मार्च-अप्रैल में यह कपास के ठूंठों से हुए फुटावों पर पनपता है।


कपास के कीड़ों के एकीकृत प्रबन्ध के लिए कार्यक्रम :
1.  बीज को भण्डारण के समय अल्यूमीनियम फास्फाइड (सैल्फास/ फास्फ्यूम/क्विकफास) की एक टिकिया (3 ग्राम) प्रति घनमीटर क्षेत्र की दर से 48-72 घंटे तक धूम्रित करें। इससे बीज में छिपी गुलाबी सूण्डियां नष्ट हो जायेंगी।
2. अप्रैल-मई में गहरी जुताई करें तथा पिछली फसल की जड़ों एवं डंठलों को एकत्रित कर नष्ट करें।
3. जल्दी तैयार होने वाली सिफारिश की गई जातियां/किस्में बोयें।
4. बिजाई सम्भवतः 25 मई तक पूरी करें। लम्बी अवधि वाली किस्मों की बिजाई कभी भी 15 मई के बाद न करें।
5. खाद का संतुलित प्रयोग करें। सिफारिश अनुसार नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश एवं जिंक खादों का प्रयोग करें। नत्रजन वाली खाद अधिक डालने से कीड़ों का प्रकोप अधिक होता है।
6. दीमक के प्रकोप से बचाव के लिए बीज को 10 मि.ली. क्लोरपायरीफास 20 ई.सी. प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। 10 मि.ली. क्लोरपायरीफास में 10 मि.ली. पानी मिलायें तथा उस सफेद घोल से एक किलो भिगोए हुए बीज को उपचारित करें। उपचारित बीज को 30 मिनट तक छाया में सुखाकर बोयें।
7. खेतों में निराई-गोड़ाई आवश्यकतानुसार करें ताकि घास-फूस नष्ट हो जाएं क्योंकि घासफूस पर कई कीड़े आश्रित रहते हैं।
8. चित्तीदार सूण्डी लगी, झुकी व सूख रही टहनियों तथा गुलाबनुमां फूलों को सप्ताह में दो बार काटें तथा इकट्ठा करके नष्ट कर दें ताकि कलियों व टिण्डों पर चित्तीदार सूण्डी व गुलाबी सूण्डी का आक्रमण कम हो। चित्तीदार व गुलाबी सूण्डी से प्रभावित कलियों, फूलों व टिण्डों (गिरे व पौधों पर लगे हुए) को इकट्ठा कर गहरा दबा दें या जला दें। अमेरीकन सूण्डियों को इकट्ठा करके कीटनाशक मिश्रित पानी में नष्ट करें।
9. मीली बग के प्रभावकारी नियंत्रण के लिए खेतों के आस-पास व खालों/नालों/रजबाहों के किनारे उगने वाले ऊपर बताए गए परपोषी पौधों को जला दें अथवा काट कर गहरा दबा दें। मार्च-अप्रैल में कपास के ठूंठों से हुए फुटाव (मोढी) व खेत में पड़े छट्टियों के ढेरों के नीचे पड़े कचरे को नष्ट करें।
10. कातरा व अन्य कीड़ों के अण्डों व सूण्डियों तथा मरोड़िया बीमारी से प्रभावित पत्तों/पौधों को कीड़ों सहित तोड़कर गहरा दबा दें या जला दें।
11. हर खेत में नियमानुसार (15 अगस्त तक हर सप्ताह तथा बाद में सप्ताह में दो बार) 10 पौधों का निरीक्षण करें तथा देखें कि वे कौन-कौन से तथा कितने कीड़ों एवं परजीवियों से प्रभावित हैं। चुने हुए पौधों पर कीड़ों की गिनती करें तथा संख्या आर्थिक कगार पर पहुंचते ही सिफारिश की गई कीटनाशकों का विधिवत छिड़काव करें तथा बाद में भी फसल पर कीड़ों का सर्वेक्षण जारी रखें। प्रमुख कीड़ों का आर्थिक कगार निम्नलिखित है।
12. बी. टी. कपास पर रस चूसने वाले कीड़ों का प्रकोप प्रायः अधिक होता है। अतः इनके नियंत्रण का विशेष ध्यान रखें। परंतु इस पर अमरीकन सूण्डी, चित्तीदार सूण्डी व गुलाबी सूण्डी का प्रकोप बहुत कम होता है। फसल पकने के समय अर्थात् अक्तूबर महीने में गुलाबी सूण्डी का प्रकोप हो सकता है, अतः आवश्यकतानुसार कीटनाशकों का छिड़काव करें।


————–बीमारियां————-

पौध गलन रोग: आरम्भ में इससे फसल को भारी हानि होती है क्योंकि मिट्टी व मिट्टी से उत्पन्न बहुत से फफूंद छोटी पौध (2-3 सप्ताह) को नष्ट कर देते हैं।
प्रायः रोगी पौधों के तनों पर मिट्टी की सतह के पास लाल -भूरे रंग के धब्बे बनने लगते हैं तथा पौधा जमीन पर गिर कर नष्ट हो जाता है। यह ध्यान रखा जाए
कि जब जमीन का तापमान कम हो तब अगेती बिजाई न की जाए क्योंकि जब बीज जमीन में ज्यादा दिन रहता है और जमाव देर में होता है तो जमीन में रहने
वाले फफूंद पौध को नष्ट कर देते हैं।

माइरोथिसियम पत्ता छेदक धब्बा रोग: एक या अधिक, गोल या अण्डाकार, लाल बैंगनी झलक लिये हल्के-भूरे रंग की फफूंद की बिन्दियों वाले धब्बे पत्तों पर दिखाई पड़ते हैं। आरम्भ में इन धब्बों का आकार पिन के सिर जैसा होता है। प्रकोप की अवस्था में धब्बे आपस में मिल जाते हैं। प्रायः रोगग्रस्त भाग पत्तों से गिर भी जाता है। इससे पत्तों में छेद हो जाते हैं। ऐसे ही लक्षण फल (टिण्डे) के नीचे की छोटी पत्ती और कभी-कभी टिण्डों पर नजर आते हैं।

जीवाणुज अंगमारी या कोणदार धब्बों का रोग: यह कपास का सबसे मुख्य रोग है। यह रोग पौधे के सभी भागों पर अपने लक्षण दिखाता है। इसके मुख्य लक्षण हैं टहनियों पर धब्बे, पत्तों पर कोनेदार धब्बे व टिण्डों पर भी धब्बे पाये जाते हैं। इस रोग के लक्षण पत्तों पर कोणदार जलसिक्त (पानीदार) धब्बों के रूप में नजर आते हैं। ये गहरे-भूरे होकर किनारों से लाल या जामुनी रंग के हो जाते हैं व कभी-कभी आपस में मिले हुए होते हैं व तनों पर लम्बे या अण्डाकार काले रंग के धब्बे बनते हैं। डोडियों पर गोल धब्बे जलसिक्त, चमकदार होकर गहरे हो जाते हैं। प्रकोप की अवस्था में कोणदार धब्बे शिराओं के पास सिमट जाते हैं और इस प्रकार शिरायें काली पड़ जाती हैं जिससे कि पत्ता सिकुड़ जाता है और पीला पड़ कर गिर जाता है।

एन्थ्रैक्नोज: यह बीमारी पौधे के हर भाग पर पौधे की किसी भी अवस्था में आती है। शिशु पौधे पर लाल-लाल धब्बे बनते हैं और सारे तने पर छा जाते हैं जिससे पौधे मर जाते हैं। जलसिक्त, अन्दर धंसे धब्बे बनते हैं जिसके किनारे लाल रंग के होते हैं और बाद में नारंगी रंग का फफूंद बीजाणु इन पर छा जाता है। रोगग्रस्त टिण्डों पर धब्बे अन्दर तक फैल जाते हैं और डोडियों पर गुलाबी पिण्ड दिखाई देता है।

जड़ गलन: यह रोग खेत में कहीं-कहीं दिखाई देता है। आरम्भ में पौधे की ऊपरी पत्तियां मुरझा जाती हैं तथा 24 घण्टे के अन्दर-अन्दर पौधा पूर्ण रूप से मुरझा जाता है व मर जाता है। रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर देखा जाये तो उनकी जड़ें कुछ चिपचिपी-सी, गली हुई लगती हैं तथा छाल भी उतरने लगती है। रोगग्रस्त पौधे को स्वस्थ पौधे की अपेक्षा आसानी से उखाड़ा जा सकता है।

उखेड़ा (विल्ट): आरम्भ में नीचे की पत्तियां किनारों से पीली पड़नी शुरू होती हैं और यह पीलापन अन्दर की तरफ बढ़ना आरम्भ हो जाता है और कुछ ही समय में पूरी की पूरी पत्ती पीली पड़ कर गिर जाती है। यह रोग नीचे से आरम्भ होकर ऊपर की तरफ बढ़ता है और कुछ ही समय में पूर्ण पौधा या पौधे का कुछ भाग खत्म हो जाता है। ऐसे पौधों को उखाड़ कर व उनकी जड़ों को लम्बाई की तरफ चीर कर देखा जाये तो भूरे रंग की धारी-सी दिखाई देती है जो कि पौधे को खुराक नहीं जाने देती और पौधा सूख जाता है। यह रोग देसी कपास में पाया जाता है।

ग्रे मिल्ड्यू: यह रोग देसी कपास में तब लगता है जब फसल लगभग पक जाती है और अधिकतर कपास पहले ही चुन ली जाती है। मिल्ड्यू के ये धब्बे पुराने पत्तों की निचली सतह पर छोटे, अनियमित व सफेद कोनेदार दिखाई पड़ते हैं। रोगग्रस्त पत्ते जल्दी ही गिर जाते हैं।

टिण्डा गलन: कई फफूंदियां, जीवाणु, कीड़े आदि मिलकर टिण्डों को गला देते हैं जिनका उपज पर सीधा प्रभाव पड़ता है। कुछ रोगाणु, जलसिक्त धब्बे छोड़ते हैं  जो बाद में काले हो जाते हैं, जिनका केन्द्र अन्दर को धंसा हुआ या नहीं भी होता है। रोगग्रस्त टिंडों को विभिन्न फफूंदियां हानि पहुंचाती हैं जिनसे रेशे गन्दे, पीले और काले पड़ जाते हैं।

पत्ती मरोड़ रोग: सबसे पहले ऊपर की कोमल पत्तियों पर इसका असर दिखाई देता है। छोटी नसें मोटी हो जाती हैं, पत्ता ज्यादा हरा दिखाई पड़ता है, पत्तियां ऊपर की तरफ मुड़ कर कप जैसी आकृति की हो जाती है और कहीं-कहीं पर पत्तियों की निचली तरफ नसों पर पत्ती की आकार की बढ़वार भी दिखाई देती है। ऐसे पौधे छोटे रह जाते हैं, इन पर फूल, कली व टिण्डे नहीं लगते, इनकी बढ़वार एकदम रुक जाती है और इसका उपज पर बहुत विपरीत असर पड़ता है। यह एक विषाणु द्वारा होता है। सफेद मक्खी इस रोग को फैलाने में सहायक है। बीज, जमीन या छूआछूत द्वारा यह रोग नहीं होता। जहां यह रोग ज्यादा हो वहां पर देसी कपास बोई जाये क्योंकि देसी कपास में यह रोग नहीं लगता। सफेद मक्खी का पूर्ण रूप से नियन्त्रण रखें। कई प्रकार के खरपतवार भी इस रोग को फैलाने में सहायक हैं। इसलिए खेतों को, आसपास के क्षेत्रों को तथा नालियों आदि को बिल्कुल साफ रखना बहुत जरूरी है। भिण्डी पर भी यह रोग पाया जाता है। इसलिए जहां पर यह रोग लगता हो वहां पर भिण्डी की काश्त न करें।

उपचार : पौधों को जमीन से उत्पन्न बहुत से फफूंदों से तथा बीज में रहने वाले जीवाणु से बचाव के लिए फफूंदनाशक दवाइयों से उपचारित करें। छिड़काव कार्यक्रम: बिजाई के 6 सप्ताह बाद अथवा जून के अन्तिम या जुलाई के पहले सप्ताह में प्लेण्टोमाइसिन (30-40 ग्राम प्रति एकड़) या स्ट्रैप्टोसाइक्लिन (6-8 ग्राम प्रति एकड़) व काॅपर आक्सीक्लोराईड (600-800 ग्राम प्रति एकड़) को 150-200 लीटर पानी में मिलाकर 15-20 दिन के अन्तर पर लगभग 4 छिड़काव करें। टिण्डा गलन रोग पर नियन्त्रण के लिए  सूण्डी नियन्त्रण वाली दवाइयों के साथ काॅपर आक्सीक्लोराईड (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) या बाविस्टिन (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) के साथ मिलाकर छिड़काव करें। इन फफूंदनाशक दवाइयों को पत्तों पर अच्छी तरह चिपके रहने के लिए चिपकने वाला पदार्थ मिलाएं। फसल की लगातार निगरानी रखनी चाहिए व पत्ती मरोड़ रोग से ग्रस्त पौधों को बढ़वार की अवस्था तक उखाड़ कर दबा देना चाहिए या जला देना चाहिए।

कपास की खेती पर इस आर्टिकल को समय के साथ अपडेट किया जाता रहेगा।

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