खेतीगन्नाफसलें

गन्ने की उन्नत किस्मों की खेती और बेहतर पैदावार के तरीके

हमारे देश में गन्ना प्रमुख रूप से नकदी फसल के रूप में उगाया जाता है, जिसकी खेती प्रति वर्ष लगभग 30 लाख हेक्टर भूमि में की जाती है, इस देश में औसत उपज 65.4 टन प्रति हेक्टर है, जो की काफी कम है, यहाँ पर मुख्य रूप से गन्ना द्वारा ही चीनी व गुड बनाया जाता है।


—– गन्ना उत्पादन में समस्याएं —–

गन्ना उत्पादन की निम्न मुख्य समस्याएं है।
1. क्षेत्र अनुसार अनुशंसित किस्मो का उपयोग न करना व पुरानी जातियों पर निर्भर रहना।
2. रोगरोधी और क्षेत्र अनुसार उपयुक्त किस्मों के उन्नत बीजों की अनुपलब्धता एवं बीजो उत्पादन कार्यक्रम का अभाव।
3.  बीज उपचार न करने से बीज जनित रोगों व कीड़ों का प्रकोप अधिक एवं एकीकृत पौध संरक्षण उपायों को न अपनाना।
4. कतार से कतार कम दूरी व अंतरवर्तीय फसलें न लेने से प्रति हेक्टेयर उपज और आय में कमी।
5. पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग नहीं किया जाना।
6. उचित जल निकास एवं सिंचाई प्रबंधन का अभाव।
7. गन्ना फसल के लिए उपयोगी कृषि यंत्रों का अभाव जिसके कारण श्रम लागत अधिक होना।

—— जलवायु और भूमि ——

गन्ने की बुवाई के समय 30-35 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान होना चाहिए, साथ ही वातावरण शुष्क होने पर बुवाई करनी चाहिए, गन्ना की खेती सभी प्रकार की भूमि में की जा सकती है, लेकिन दोमट भूमि सर्वोतम मानी जाती है, गन्ने के खेत में जल निकास की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए, यहाँ तक की गन्ने की खेती अच्छे जल निकास वाली चिकनी भूमि में भी की जा सकती हैI

—– उन्नतशील प्रजातियाँ—–

—– उत्तर प्रदेश >> 

शीघ्र पकने वाली : कोयम्बटूर शाहजहांपुर 8436, 88230,95255,96268,98231,95436 एवं कोयम्बटूर सेलेक्शन-00235 तथा 01235 आदि हैं, इसी तरह से

मध्य एवं देर से पकने वाली : कोयम्बटूर शाहजहांपुर 8432, 94257, 84212, 97264, 95422, 96275, 97261, 96269, 99259 एवं यू. पी. 0097 जिसे ह्रदय भी कहते हैं, यू. पी.-22 कोयम्बटूर पन्त 84212 तथा कोयम्बटूर सेलेक्शन 95422, व 96436 आदि हैं, इसी तरह से

देर से बोई जाने वाली : कोयम्बटूर शाहजहांपुर 88230, 95255, यू पी-39 तथा कोयम्बटूर सेलेक्शन 92423 आदि हैंI

—– मध्य प्रदेश >>

शीघ्र पकने वाली : को.सी.-671, को.जे.एन. 86-141, को.86-572, को. 94008, को.जे.एन.9823

मध्य एवं देर से पकने वाली : को. 86032, को. 7318, के. 99004, को.जे.एन.86-600, को.जे.एन.9505

—– खेत की तैयारी —–

खेत की ग्रीष्म काल में अप्रेल से 15 मई के पूर्व एक गहरी जुताई करें। इसके पश्चात 2 से 3 बार देशी हल या कल्टीवेटर, से जुताई कर तथा रोटावेटर व पाटा चलाकर खेत को भुरभुरा, समतल एवं खरपतवार रहित कर लें एवं रिजर की सहायता से 3 से 4.5 फुट की दूरी में 20-25 से.मी. गहरी कूड़े बनाये।आखिरी जुताई के समय 20 से 25 टन सड़ी गोबर की खाद खेत में मिलकर तैयार करना चाहिए।

—– बुवाई का समय —–

गन्ने की बुवाई वर्ष में दो बार की जाती है।

शरदकालीन बुवाई : इसमें अक्टूबर -नवम्बर में फसल की बुवाई करते हैं और फसल 10-14 माह में तैयार होती है।

बसंत कालीन बुवाई : इसमें फरवरी से मार्च तक फसल की बुवाई करते है। इसमें फसल 10 से12 माह में तैयार होती है।

—– बीज का चुनाव और मात्रा तथा बीज उपचार —–

गन्ने के सारे रोगों की जड़ अस्वस्थ बीज का उपयोग ही है। गन्ने की फसल उगाने के लिए पूरा तना न बोकर इसके दो या तीन आंख के टुकड़े काटकर उपयोग में लायें। गन्ने ऊपरी भाग की अंकुरण 100 प्रतिशत, बीच में 40 प्रतिशत और निचले भाग में केवल 19 प्रतिशत ही होता है। दो आंख वाला टुकड़ा सर्वोत्तम रहता है। शुद्ध रोग रहित व कीट मुक्त गन्ना अच्छे खेत से स्वस्थ बीज का चुनाव करें, गन्ने के 1/3 उपरी भाग का जमाव अच्छा होता है, गन्ने की मोटाई के अनुसार बीज की मात्रा कम-ज्यादा होती है, 50-60 कुंतल लगभग 37500 तीन आंख वाले टुकड़े प्रति हेक्टर लगते हैं, अधिक देर से बुवाई करने पर डेढ़ गुना बीज की आवश्यकता पड़ती है, दो आँख वाले टुकड़े 56000 प्रति हेक्टर लगते हैं। बीज जनित रोग व कीट नियंत्रण हेतु कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी व क्लोरोपायरीफास 5 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से घोल बनाकर आवश्यक बीज का 15 से 20 मिनिट तक उपचार करें।

—– बुवाई विधि —–

गन्ने की बुवाई हल के पीछे लाइनों में करनी चाहिए, लाइन से लाइन की दूरी बुवाई के मौसम एवं समय के आधार पर अलग-अलग रखी जाती है। शरद एवं बसंत की बुवाई में 90 सेंटीमीटर तथा देर से बुवाई करने पर 60 सेंटीमीटर लाइन से लाइन की दूरी रखी जाती है। टुकड़े से टुकड़े की दूरी 20 सेंटीमीटर दो आंख वाले गन्ने की रखी जाती है। सामान्यतः मेड़नाली पद्वति से बनी 20-25 सेंटीमीटर बनी गहरी कूड़ों में सिरा से सिरा या आंख से आंख मिलाकर सिंगल या डबल गन्ना टुकड़े की बुवाई की जाती है। बिछे हुए गन्ने के टुकड़ों के ऊपर 2 से 2.5 से.मी. से अधिक मिट्टी की परत न हो अन्यथा अंकुरण प्रभावित होता है।

—– खाद एवं उर्वरक ——

फसल के पकने की अवधि लम्बी होने कारण खाद एवं उर्वरक की आवश्यकता भी अधिक होती है अतः खेत की अंतिम जुताई से पूर्व 20 टन सड़ी गोबर या कम्पोस्ट खाद खेत में समान रूप से मिलाना चाहिए इसके अतिरिक्त 300 किलो नाइट्रोजन (650 कि.ग्रा. यूरिया ), 80 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, (500 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट) एवं 60 किलोग्राम पोटाश (100 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश) प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। फॉस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय प्रयोग करें एवं नाइट्रोजन की मात्रा को निम्नानुसार प्रयोग करें। नाइट्रोजन उर्वरक के साथ नीम खली का चूर्ण मिलाकर प्रयोग करने से उर्वरक की उपयोगिता बढ़ती है साथ ही दीमक से भी सुरक्षा मिलती है। 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट व 50 किलोग्राम फेरस सल्फेट 3 वर्ष के अंतराल में जिंक व आयरन सूक्ष्म तत्व की पूर्ति के लिए आधार खाद के रूप में बुवाई के समय उपयोग करें।

—– शरदकालीन गन्ना —–

शरदकालीन गन्ने में नाइट्रोजन की कुल मात्रा को चार समान भागों में बाँट कर बोनी के क्रमशः 30, 90, 120 एवं 150 दिन में प्रयोग करें।

—– बसन्तकालीन गन्ना —– 

बसन्तकालीन गन्ने में नाइट्रोजन की कुल मात्रा को तीन समान भागों में बाँट कर बोनी के क्रमशः 30, 90 एवं 120 दिन में प्रयोग करें।

—– उत्तर प्रदेश के लिए उर्वरक —–

150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस, एवं 40 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में प्रति हेक्टर। इसके साथ ही 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टर प्रयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन कि 1/3 भाग मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश कि पूरी मात्रा बुवाई के पूर्व कुंडो में डालते हैं।  जिंक सल्फेट कि पूरी मात्रा खेत तैयार करते समय या पहली सिंचाई के बाद ओट आने पर पौधों के पास देकर गुडाई करनी चाहिए। शेष नाइट्रोजन कि मात्रा अप्रैल मई के माह में दो बार में समान हिस्सों में बाट कर प्रयोग करना चाहिए ।
नोट : अच्छे उत्पादन के लिए मिटटी परिक्षण के आधार पर उर्वरक उपयोग करें।


—– सिंचाई —–

सिंचाई, बुवाई एवं क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग समय एवं तरीके से की जाती है । गर्मी के दिनों में भारी मिट्टी वाले खेतों में 8-10 दिन के अंतर पर एवं ठंड के दिनों में 15 दिनों के अंतर से सिंचाई करें। हल्की मिट्टी वाले खेतों में 5-7 दिनों के अंतर से गर्मी के दिनों में व 10 दिन के अंतर से ठंड के दिनों में सिंचाई करना चाहिये। सिंचाई की मात्रा कम करने के लिये गरेड़ों में गन्ने की सूखी पत्तियों की पलवार की 10-15 से.मी. तह बिछायें। गर्मी में पानी की मात्रा कम होने पर एक नाली छोड़कर सिंचाई देकर फसल बचावें। कम पानी उपलब्ध होने पर ड्रिप (टपक विधि) से सिंचाई करने से भी 60 प्रतिशत पानी की बचत होती है। गर्मी के मौसम तक जब फसल 5-6 महीने तक की होती है स्प्रींकलर (फव्वारा) विधि से सिंचाई करके 40 प्रतिशत पानी की बचत की जा सकती है। वर्षा के मौसम में खेत में उचित जल निकास का प्रबंध रखें। खेत में पानी के जमाव होने से गन्ने की बढ़वार एवं रस की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उत्तर प्रदेश में पूर्वी क्षेत्र में 4-5, मध्य क्षेत्र में 5-6, तथा पश्चिमी क्षेत्र में 7-8, सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है, इसके साथ ही दो सिंचाई वर्षा के बाद करना लाभप्रद पाया गया है।


—– निराई एवं गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण —–

गन्ने के पौधों की जड़ों को नमी व वायु उपलब्ध करने हेतु तथा खरपतवार नियंत्रण को ध्यान में रखते हुए ग्रीष्म काल में प्रत्येक सिंचाई के बाद गुड़ाई फावड़ा, कस्सी या कल्टीवेटर से करना लाभदायक होता है

अंधी गुड़ाईः गन्ने का अंकुरण देर से होने के कारण कभी-कभी खरपतवारों का अंकुरण गन्ने से पहले हो जाता है। जिसके नियंत्रण हेतु एक गुड़ाई करना आवश्यक होता है जिसे अंधी गुड़ाई कहते है।

निराई-गुड़ाई: आमतौर पर प्रत्येक सिंचाई के बाद एक गुड़ाई आवश्यक होगी इस बात का विशेष ध्यान रखें कि व्यांत अवस्था (90-100 दिन) तक निराई-गुड़ाई का कार्य करते रहे।

मिट्टी चढ़ाना: वर्षा प्रारम्भ होने तक फसल पर मिट्टी चढ़ाने का कार्य पूरा कर लें (120 व 150 दिन) ।  जड़ पर जून माह के अंत में हल्की मिटटी चढ़ानी चाहिए, इसके बाद जब फसल थोड़ी और बढवार कर चुके तब जुलाई के अंत में दुबारा पर्याप्त मिटटी और चढ़ा देना चाहिए, जिससे की वर्षा होने पर फसल गिर ना सके।

रासायनिक खरपतवार नियंत्रणः बुवाई पश्चात अंकुरण पूर्व खरपतवारों के नियंत्रण हेतु एट्राजीन 2.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 600 लीटर पानी में घोल बनाकर बुआई के एक सप्ताह के अन्दर खेत में समान रूप से छिड़काव करें। खडी फसल में चैड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए 2-4-डी सोडियम साल्ट 2.8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 600 लीटर पानी का घोल बनाकर बुवाई के 45 दिन बाद छिड़काव करें। उपरोक्त नीदानाशकों के उपयोग के समय खेत में नमी आवश्यक है।

इंटर क्रॉपिंग : गन्ने की फसल की बढ़वार शुरू के 2-3 माह तक धीमी गति से होती है। इस अवधि में गन्ने की दो कतारों के बीच का स्थान काफी समय तक खाली रह जाता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए यदि कम अवधि की फसलों को अन्तरवर्ती खेती के रूप में उगाया जाये तो निश्चित रूप से गन्ने के फसल के साथ-साथ प्रति इकाई अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हो सकती है। इसके लिये निम्न फसलें अन्तरवर्ती खेती के रूप में ऊगाई जा सकती है।

शरदकालीन खेतीः गन्ना+आलू(1:2), गन्ना + प्याज (1:2), गन्ना+मटर(1+1),गन्ना+धनिया(1:2) गन्ना+चना(1:2), गन्ना+गेंहू(1:2)

बसंतकालीन खेतीः गन्ना + मूंग(1+1), गन्ना +उड़द (1+1), गन्ना+धनिया (1:3), गन्ना +मेथी (1:3),

—– गन्ने के प्रमुख कीट —–

अग्रतना छेदक : शीतकालीन बुवाई- अक्टूबर-नवम्बर में करें। गन्ना बीज को बुवाई के पूर्व 0.1 प्रतिशत क्लोरोपाइरीफास 20 ई.सी. घोल में 20 मिनिट तक उपचारित करे। प्रकोप बढ़ने पर फोरेट 10 जी 15-20 कि.ग्रा हे. या कार्बाफ्यूरान 3 जी 33 कि.ग्रा/हे. का उपयोग करें

पाईरिल्ला : आवश्यकता पड़ने पर क्विनालफास 25 ई.सी. 1.5 ली./हे. घोल का छिड़काव, मैलाथियान 50 ई.सी. 2.0 ली./हे. की दर से 1000 ली/हे. पानी के साथ छिड़काव

शीर्ष तना छेदक : प्रकोप बढ़ने पर फोरेट 10 जी 15-20 कि.ग्रा हे. या कार्बाफ्यूरान 3 जी 33 कि.ग्रा/हे. का उपयोग करें।

सफेद मक्खी : एमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 350  मि.ली., 600 लीटर प्रति हेक्टेयर पानी के साथ उपयोग करें।

—– गन्ने के प्रमुख रोग —–

कंडवा रोग : कंडवा रोग अवरोधी किस्में जैसे सी.ओ.जे.एन.86,141, सी.ओ.जे.एन.86,572 सी.ओ.जे.एन.86,600, बुवाई पूर्व कार्बाक्सिन पावर 2 ग्राम प्रति ली. दर से घोल बनाकर बीज उपचार। रोगग्रसित पौधों को सावधानी से निकालकर नष्ट करें

लाल सड़न रोग : लाल सड़न अवरोधी किस्म सी.ओ.जे.एन. 86141 लगायें। बुवाई के समय एम.एच.ए.टी. 54 डिग्री से.ग्री., 80 प्रतिशत नमी पर 4 घंटे तक बीज उपचार।  उचित जल निकास रखें। बीज उपचार कार्बन्डाजिम या वीटावेक्स पावर 2 ग्राम प्रति लीटर के घोल में 20 मिनिट तक उपचार।

उकठा रोग : उकठा अवरोधी जातियों-सी.ओ.जे.एन.86141, सी.ओ.जे.एन. 86600।, बुवाई पूर्व बीज उपचार कार्बन्डाजिम या वीटावेक्स पावर 2 ग्राम प्रति लीटर के घोल में 20 मिनिट तक उपचार। उचित जल निकास करें।

ग्रासी सूट : बुवाई के समय एच.एच.ए.टी. 54 डिग्री से.ग्री., 80 प्रतिशत नमी पर 4घंटे तक बीज उपचार। पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग। गन्ना काटते समय औजार स्वच्छ हों।

गन्ने की कटाई
उत्तर प्रदेश के एक गाँव में गन्ने के फ़सल की कटाई करता हुआ एक किसान परिवार

—– फसल की कटाई —–

फसल की आयु ,परिपक्वता, प्रजाति तथा बुवाई के समय के आधार पर नवम्बर से अप्रैल तक कटाई की जाती है, कटाई के पश्चात गन्ना को सीधे शुगर फेक्ट्री में भेज देना चाहिए, काफी समय रखने पर गन्ने का वजन घटने लगता है तथा शुगर प्रतिशत कम हो जाता है यदि शुगर फेक्ट्री नहीं भेज जा सके तो उतने ही गन्ने की कटाई करनी चाहिए जिसका गुड़ बनाया जा सके ज्यादा कटाई पर नुकसान होता है। फसल की कटाई उस समय करें जब गन्ने में सुक्रोज की मात्रा सबसे अधिक हो क्योंकि यह अवस्था थोड़े समय के लिये होती है और जैसे ही तापमान बढ़ता है सुक्रोज का ग्लूकोज में परिवर्तन प्रारम्भ हो जाता है और ऐसे गन्ने से शक्कर एवं गुड़ की मात्रा कम मिलता है। कटाई पूर्व पकाव सर्वेक्षण करें इस हेतु रिफलेक्टो मीटर का उपयोग करें यदि माप 18 या इसके उपर है तो गन्ना परिपक्व होने का संकेत है। गन्ने की कटाई गन्ने की सतह से करें।

—– उपज —–

गन्ने की उपज प्रजातियों के आधार पर अलग अलग पायी जाती है, शीघ्र पकने वाली प्रजातियाँ 80-90 टन प्रति हेक्टर उपज प्राप्त होती है,  मध्य एवं देर से पकने वालीं प्रजातियाँ में 90-100 टन प्रति हेक्टर उपज प्राप्त होती है ।  उन्नत वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग कर लगभग 1000 से 1500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक गन्ना प्राप्त किया जा सकता है।

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