किसान और सरकारसंपादक की पसंद

सरकार की कारपोरेट परस्त कृषि नीतियां

मैं उस दिन का इंतजार कर रहा हूं, जब देश के वित्त मंत्री आर्थिक विकास का आकलन इस आधार पर करेंगे कि कितने लोगों को गरीबों से बाहर निकाला गया, कितने भूखे लोगों तक अनाज पहुंचाया गया और किसानों की आत्महत्या में कितनी कमी आई।

जबसे खरीफ फसल मंडियों में आई है, इसके दाम गिर गए हैं। देशभर के किसान अपनी लागत तक नहीं निकाल सक रहे हैं। कोई भी हफ्ता नहीं बीतता जब हमें देश के किसी न किसी हिस्से में किसानों के प्रदर्शन की खबरें पढ़ने को न मिलें। किसानों की आत्महत्या भी थमने का नाम नहीं ले रही हैं और कृषि क्षेत्र का संकट लगातार बढ़ता जा रहा है।
सितंबर-अक्टूबर के दौरान कीमतें नीचे बनी रहीं। मैं आपके सामने एक उदाहरण रख रहा हूं, जिससे आपको 27 सितंबर को देशभर की मंडियों में किसानों की स्थिति का अंदाजा होगा। मध्य प्रदेश की हरदा और मंदसौर मंडियों में सोयाबीन के औसत दाम क्रमशः 2660 रुपये और 2880 रुपये थे, जबकि एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य (बोनस मिलाकर) 3,050 रुपये है। यानी किसानों को प्रत्येक क्विंटल के पीछे चार सौ से पांच सौ रुपये का घाटा उठाना पड़ा। इसी तरह उड़द दाल का एमएसपी (बोनस सहित) 5,400 रुपये क्विंटल है, लेकिन मंदसौर में इसका दाम था 3,725 रुपये, राजस्थान के कोटा में 3,850 रुपये, कर्नाटक के बीदर में 4,180 रुपये और महाराष्ट्र के अकोला में 4,410 रुपये था। उड़द पैदा करने वाले देशभर के किसानों को प्रति क्विंटल एक हजार रुपये से लेकर 1,800 रुपये तक का घाटा उठाना पड़ा।

साल दर साल किसान बंपर फसल पैदा करने के लिए मेहनत करते हैं और जब वह फसल की कटाई करते हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि वह वास्तव में घाटे की खेती कर रहे हैं।

कुछ दिनों पहले ही अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्था (आईएफपीआरआई) ने हाल ही में वार्षिक ग्लोबल हंगर इंडेक्स जारी किया है। वैश्विक भूख सूचकांक में तीन स्थान और नीचे खिसकर भारत 119 देशों में सौवें स्थान के साथ गंभीर श्रेणी में रखा गया है। बांग्लादेश और उत्तर कोरिया जैसे देश भारत से बेहतर स्थिति में हैं। यह सूचकांक ऐसे समय आया है, जब राष्ट्रीय पोषण निगरानी ब्यूरो (एनएनएमबी) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण में ऐसी खतरनाक सच्चाई सामने आई है, जिसे देश शायद जानना नहीं चाहता। ग्रामीण भारत में लोगों का भोजन चालीस वर्ष पहले की तुलना में घट गया है, यानी लोग कम भोजन कर रहे हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण भारतीय 1975-79 की तुलना में औसतन 550 कैलोरी, 13 ग्राम प्रोटीन, पांच एमजी आयरन, 250 एमजी कैल्सियम और करीब पांच सौ एमजी विटामिन कम ग्रहण कर रहा है। यदि देश की आबादी में सत्तर फीसदी की हिस्सेदारी करने वाली ग्रामीण आबादी कम खा रही है और अल्पपोषित है, तो यह खतरे की घंटी है।

तीन वर्ष से कम उम्र के बच्चे रोजाना 80 एमएल दूध ही पी रहे हैं, जबकि उनकी जरूरत 300 एमएल की है। यह आंकड़े बताते हैं कि आखिर क्यों 35 फीसदी ग्रामीण पुरुष और महिलाएं अल्पपोषित और 42 फीसदी बच्चे कम वजन के पाए गए। घरों में होने वाले खर्च को लेकर किए गए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण से पता चला है कि 80 फीसदी ग्रामीण और 70 फीसदी शहरी आबादी बुनियादी पोषण के लिए रोजाना जरूरी 24 सौ कैलोरी ग्रहण नहीं कर पाते।

लेकिन यदि आपने आर्थिक विकास को गति देने के वास्ते भारी आर्थिक पैकेज की घोषणा के लिए आयोजित वित्त मंत्री अरुण जेटली की प्रेस कांन्फ्रेंस देखी हो, तो आपने देखा होगा कि उन्होंने ‘कृषि’ शब्द का एक बार भी इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने 83,677 किलोमीटर लंबी सड़कों के निर्माण के लिए 6.92 लाख करोड़ रुपये की योजनाओं और बैंकों को 2.11 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी देने की घोषणा की। दरअसल इसके पीछे यही विचार है कि बैंकों को इतना धन दिया जाए ताकि वे कॉरपोरेट के खराब (डूबत) कर्ज की भरपाई कर सकें। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस खेती पर 60 फीसदी आबादी निर्भर है, वह सरकार के आर्थिक चिंतन में शामिल ही नहीं है।

देश की आर्थिक रफ्तार पर भले ही गर्व किया जाए, मगर यह चिंताजनक है कि भूख की बदहाल स्थिति वित्त मंत्रालय को परेशान नहीं कर रही है। देहात में किसान रोजाना आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन मुख्यधारा के अर्थशास्त्रियों को यह बात जरा भी परेशान नहीं करती। उनके लिए आर्थिक विकास का सिर्फ एक मतलब है आधारभूत ढांचे के नाम पर भवनों का निर्माण। उन लोगों ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का वह अध्ययन नहीं पढ़ा होगा, जो यह कहता है कि गरीबी और भूख से निजात पाने के लिए आधारभूत संरचना से कहीं अधिक कारगर कृषि क्षेत्र में निवेश है। जरा कल्पना कीजिए कि यदि 83,677 किलोमीटर लंबी सड़कों के निर्माण के लिए दिए जा रहे 6.92 लाख करोड़ रुपये के पैकेज को हाईवे के बजाए कृषि में खर्च किया जाए तो इससे अर्थव्यवस्था को बड़ी खुराक मिलेगी। इससे लाखों लोगों का जीवन स्तर सुधर जाएगा, लाखों लोगों को भूख से उबारने में मदद मिलेगी और इससे किसानों की आत्महत्या भी कम हो सकती है।

यदि वित्त मंत्री ने डूबते कर्ज से उबारने के बजाए बैंकों को कृषि कर्ज से उबारने के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपये देने की घोषणा की होती तो सुस्ती गति से चल रही अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आती। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, तमिलनाडु, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में ही बकाए कृषि कर्ज को खत्म कर दिया जाए तो कृषि से जुड़े 1.8 करोड़ परिवारों को फायदा होगा।

दरअसल आर्थिक सोच में ही बुनियादी गड़बड़ी है और इस सोच का निर्माण पिछले कुछ दशकों में किया गया है। मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यिम ने कुछ समय पहले बहुत बेपरवाही के साथ कहा था कि कॉरपोरट कर्ज खत्म करना आर्थिक विकास है। लेकिन जब किसानों के कर्जमाफी की बात आई, तो रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल ने कहा कि इससे देश की बैलेंस सीट खराब हो जाएगी।

वास्तव में मैं उस दिन का इंतजार कर रहा हूं, जब देश के वित्त मंत्री आर्थिक विकास का आकलन इस आधार पर करेंगे कि कितने लोगों को गरीबों से बाहर निकाला गया, कितने भूखे लोगों तक अनाज पहुंचाया गया और किसानों की आत्महत्या में कितनी कमी आई।

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