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गन्ना उगाने वाले किसानों के प्रति भाजपा सरकार का दायित्व

उत्तर प्रदेश शुगर मिल्स एसोसिएशन द्वारा राज्य के मुख्य सचिव को लिखे एक पत्र में चालू फसल वर्ष के लिए किसानों से खरीदे जाने वाले गन्ने के दाम में बढ़ोतरी न किए जाने की मांग की गई है। मिल मालिकों की दलील है कि किसानों को दिए जाने वाले भाव में बढ़ोतरी से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।

कृषि मंत्रालय द्वारा खरीफ फसलों की पैदावार को लेकर जारी अग्रिम अनुमान में गन्ने को छोड़कर अन्य सभी फसलों के उत्पादन में गिरावट दर्ज हुई है। इस वर्ष के लिए अनुमानित गन्ना उत्पादन में 10 फीसदी की वृद्धि को लेकर किसानों में उत्साह बढ़ा ही था कि उद्योग-सरकार के बीच की एक सिफारिश ने उन्हें पुनः निराश कर दिया। दरअसल, उत्तर प्रदेश शुगर मिल्स एसोसिएशन द्वारा राज्य के मुख्य सचिव को लिखे एक पत्र में चालू फसल वर्ष के लिए किसानों से खरीदे जाने वाले गन्ने के दाम में बढ़ोतरी न किए जाने की मांग की गई है। मिल मालिकों की दलील है कि किसानों को दिए जाने वाले भाव में बढ़ोतरी से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। 

संगठन द्वारा यह बात भी कही गई कि पिछले तीन वर्षों से चीनी उद्योग निरंतर घाटे में जा रहा है और इस वर्ष खरीद मूल्य को यथावत रख उनकी रक्षा की जाए। इतना ही नहीं, मिलों द्वारा सरकार से यह गुहार भी लगाई है कि किसानों को गन्ने की कीमत भुगतान करने के लिए उन्हें दो किस्तों का विकल्प और कॉपरेटिव सोसाइटी को दिए जाने वाले कमीशन को दो रुपये प्रति क्विंटल कर दिया जाए। वर्तमान में चीनी मिलों द्वारा कॉपरेटिव सोसाइटी को 7.65 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से कमीशन देने का प्रावधान है। महत्वपूर्ण है कि मिल संगठन का यह प्रस्ताव किसानों द्वारा गन्ना खरीद मूल्य बढ़ाने की जोरदार मांग के कुछ दिनों बाद भेजा गया है।किसानों का आरोप है कि वर्तमान राज्य समर्थित मूल्य (एसएपी) जो 305 रुपये प्रति क्विंटल है, उनकी लागत मूल्य से काफी कम है, जिससे लागत मूल्य निकालना भी कठिन हो जाता है।

नई फसल वर्ष में उनकी मांग है कि गन्ने के एसएपी में 95 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि कर 400 रुपये कर दिया जाए। गौरतलब है कि पिछले तीन वर्षों से राज्य में गन्ने के भाव में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। वर्ष 2016 के नवंबर में चुनावीउद्देश्यों से इसमें 25 रुपये की मामूली वृद्धि किसानों को मौजूदा संकट से उबारने के लिए नाकाफी ही थी। महत्वपूर्ण यह भी है कि इस दौरान केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित एफआरपी यानी फेयर रिम्युरेटिव प्राइज में भी कोई इजाफा नहीं हुआ और यह 230 रुपये प्रति क्विंटल पर टिका रहा। दो लगातार वर्षों के बाद फसल वर्ष 2017-18 के लिए केंद्र सरकार ने एफआरपी में 25 रुपये प्रति क्विंटल का इजाफा कर 255 रुपये प्रति क्विंटल किया गया। यानी वर्तमान में एफआरपी 255 और एसएपी 305 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से प्रदत्त है। 

तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रदेश में चुनाव से पूर्व के वर्ष गन्ना किसानों की नजरअंदाजी के साक्ष्य रहे हैं। ऐसे में मिल मालिकों द्वारा किसानों को दिए जाने वाले खरीद मूल्य में इजाफा न करने की हो रही सिफारिशें उनका हक मारने की कोशिश है। 

उत्तर प्रदेश के लगभग 67 फीसदी जिलों में कमोबेश गन्ने की खेती होती है। तकरीबन 50 लाख लोग इस पेशे से जुड़े हैं। पिछली सरकारों की नजरअंदाजी के कारण ही सही, गन्ना उत्पादक समेत समूचे किसान वर्ग ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया। मोदी और योगी दोनों द्वारा गन्ना किसानों को उचित दाम देने का वादा भी किया गया। चूंकि विधानसभा चुनाव के अपने घोषणा पत्र में भाजपा ने 120 दिनों के अंदर बकाया राशि का भुगतान करने और भविष्य में गन्ना खरीदने के 14 दिनों के अंदर भुगतान करवाए जाने की बात कही थी, किसानों की उम्मीदें बढ़ी है। अब पूर्ण बहुमत की सरकार का भी दायित्व है कि किसानी मसलों पर खरा उतर उन्हें उपेक्षित होने से बचाए।

सरकार की कारपोरेट परस्त कृषि नीतियां

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