फसलें

चने की उन्नत और बढ़िया पैदावार वाली वैज्ञानिक खेती

चने की खेती दलहनी फसलों में चने का प्रमुख स्थान है। अधिक पैदावार प्राप्त करने हेतु निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। मुख्य बिन्दु: १. क्षेत्रीय अनुकूलतानुसार प्रजाति का चयन कर प्रमाणित एवं शुद्ध बीज का प्रयोग करें | २. बेसल ड्रेसिंग फास्फोरसधारी  उर्वरकों का कूड़ो में संस्तुति  अनुसार अवश्य पर्योग करें | ३. रोगों एवं फलीछेदक कीड़ों की सामयिक जानकरी कर उनका उचित नियंत्रण/उपचार किया जाय | ४. पाइराइट जिप्सम/ सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में सल्फर की प्रतिपूर्ति करें | ५. बीजशोधन अवश्य करें | ६. चने में फूल आते समय सिंचाई न करें | ७. देर से बुवाई हेतु शीघ्र पकने वाली प्रजाति का प्रयोग करें | ८. काबुली चने में २ प्रतिशत बोरेक्स का छिड़काव करें | ९. कीट एवं  रोग का समय सड़े नियंत्रण करें | १०.चने की बुवाई उत्तर-दक्षिण दिशा में नहीं  करें | ११.असिंचित दशा में २% यूरिया या डी. ए. पी. का छिड़काव फूल आते समय करना चाहिए |   मृदा चयन: चने के लिए दोमट या भारी दोमट मार एवं मडुआ भूमि जहाँ पानी का निकास का उचित प्रबन्ध हो, उपयुक्त होती है |   संस्तुत प्रजातियाँ : चने की प्रजातियों का विवरण:  क्रं. सं. प्रजाति उत्पादन क्षमता (कु./हे.) पकने की अवधि उपयुक्त क्षेत्र   विशेषताएं अ. देशी प्रजातियां :…

गेहूँ की उन्नत पैदावार के लिये खेती के वैज्ञानिक तौर तरीके

गेहूँ की उपज लगातार बढ रही है। यह वृध्दि गेहूँ की उन्नत किस्मों तथा वैज्ञानिक विधियों से हो रही है। यह बहुत ही आवश्यक है कि गेहूँ का उत्पादन बढाया जाय जो कि बढती हुई जनसंख्या के लिए आवश्यक है। गेहूँ की खेती पर काफी अनुसंधान हो रहा है और उन्नत किस्मों के लिए खेती की नई विधियां निकाली जा रही है। इसलिए यह बहुत ही आवश्यक है कि प्रत्येक किसान को गेहूँ की खेती की नई जानकारी मिलनी चाहिए जिससे वह गेहूँ की अधिक से अधिक उपज ले सके। गेहूँ की अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिये निम्न बातों पर ध्यान देना आवश्यक है : १. शुद्घ एवं प्रमाणित बीज की बुआई बीज शोधन के बाद की जाये। २. प्रजाति का चयन क्षेत्रीय अनुकूलता एवं समय विशेष के अनुसार किया जायें। ३. तीसरे वर्ष बीज अवश्य बदल दिये जायें। ४. संतुलित मात्रा में उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर सही समय पर उचित विधि से किया जायें। ५. क्रान्तिक अवस्थाओं (ताजमूल अवस्था एवं पुष्पावस्था) पर सिंचाई समय से उचित विधि एवं मात्रा में की जाय। ६. कीड़े एवं बीमारी से बचाव हेतु विशेष ध्यान दिया जाये। ७. गेहूँसा के प्रकोप होने पर उसका नियंत्रण समय से किया जाये। ८. अन्य क्रियायें संस्तुति के…

वैज्ञानिक विधि से आलू की खेती

भारत में वैज्ञानिक ढंग से आलू  का उत्पादन आलू भारत की एक महत्वपूर्ण फ़सल है। उत्पादन की दृष्टि से इसका स्थान हमारे देश में चावल एवं गेहूं के बाद तीसरा है। हाल के कुछ वर्षो में दुनियाँ में बढ़ती जनसंख्या एवं खाद्यान की कमी को देखते हुए आलू को खाद्य सुरक्षा फ़सल के एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। हिमाचल प्रदेश में आलू एक नकदी फ़सल के रूप में उगाई जाती है। आलू उत्पादन में इसके बीज का खास महत्व है। कहा जाता है कि यदि आलू का बीज उत्तम गुणवत्तायुक्त हो तो फ़सल उत्पादन की आधी समस्या दूर हो जाती है। भारत के कुल बीज आलू उत्पादन का 94% हिस्सा मैदानी क्षेत्रों एवं 6% पहाड़ी क्षेत्रों से आता है। हिमाचल की जलवायु स्वस्थ बीज आलू उत्पादन के लिए उपयुक्त है। आज भी हिमाचल प्रदेश, देश के कई पर्वतीय राज्यों जैसे जम्मू कश्मीर,उतराखण्ड तथा उत्तरपूर्वी राज्यों को बीज आलू की आपूर्ति करता है। लेकिन प्रदेश में आलू की उपज देश के अन्य राज्यो के मुक़ाबले काफी कम है। किसानों को स्वस्थ बीज आलू उपलब्ध न होना एवं कीटनाशकों का प्रयोग उचित मात्रा व समय पर न करना कम उपज के मुख्य कारण है। अतः किसानो को…

गन्ने की उन्नत किस्मों की खेती और बेहतर पैदावार के तरीके

हमारे देश में गन्ना प्रमुख रूप से नकदी फसल के रूप में उगाया जाता है, जिसकी खेती प्रति वर्ष लगभग 30 लाख हेक्टर भूमि में की जाती है, इस देश में औसत उपज 65.4 टन प्रति हेक्टर है, जो की काफी कम है, यहाँ पर मुख्य रूप से गन्ना द्वारा ही चीनी व गुड बनाया जाता है। —– गन्ना उत्पादन में समस्याएं —– गन्ना उत्पादन की निम्न मुख्य समस्याएं है। 1. क्षेत्र अनुसार अनुशंसित किस्मो का उपयोग न करना व पुरानी जातियों पर निर्भर रहना। 2. रोगरोधी और क्षेत्र अनुसार उपयुक्त किस्मों के उन्नत बीजों की अनुपलब्धता एवं बीजो उत्पादन कार्यक्रम का अभाव। 3.  बीज उपचार न करने से बीज जनित रोगों व कीड़ों का प्रकोप अधिक एवं एकीकृत पौध संरक्षण उपायों को न अपनाना। 4. कतार से कतार कम दूरी व अंतरवर्तीय फसलें न लेने से प्रति हेक्टेयर उपज और आय में कमी। 5. पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग नहीं किया जाना। 6. उचित जल निकास एवं सिंचाई प्रबंधन का अभाव। 7. गन्ना फसल के लिए उपयोगी कृषि यंत्रों का अभाव जिसके कारण श्रम लागत अधिक होना। —— जलवायु और भूमि —— गन्ने की बुवाई के समय 30-35 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान होना चाहिए, साथ ही वातावरण शुष्क होने पर…

धान की फ़सल और उसके बढ़ने की विभिन्न अवस्थाएं

धान का पौध और वृध्दि अवस्थाएं ग्रैमिनी कुल के अन्य एक वर्शी पौधों के समान धान का प्रौधा संयुक्त तना (कल्म के रूप में प्रसिध्द) अधिक सपाट पत्तिायॉ और अंतस्थ पुश्पगुच्छ रखता है। अवस्था 0 – अंकुरण से लेकर निर्गमन तक सामान्यत:  इसके बीज 24 घंटे तक भिगोने और उसके बाद दूसरे 24 घंटे तक ऊश्मायित करके पहले से अंकुरित कर लिए जातें हैं। पूर्व – अंकुरण के बाद मूलांकुर एव प्रांकुर पुश्प से बाहर निकल आते है बीज क्यारी में बोआई के दूसरे या तीसरे दिन तक प्रांकुर चोल से पहलीपत्ती फूटती हैं अवस्था 0 की समाप्ति तक अभी निकली हुई मुड़ी हुई प्राथमिक पत्ती ओर व लंबे मूलांकुर दिखाई देते हैं। अवस्था 1 – बेहन (बोआई) बेहन अवस्था निकलने के ठीक बाद प्रारम्भ होती है। और पहली दोजी प्रकट होने से ठीक पहले तक चलती है। इस अवस्था के दौरान प्रारम्भिक जड़े और 5 पत्तिायों तक उत्पन्न हो जाती हैं। जैसे – जैसे पौध बढ़ना जारी रखती है, दो अधिक पत्तिायाँ विकसित हो जाती है। प्रारम्भिक अवस्था के दौरान प्रत्येक 3-4 दिनों पर 1 पत्ताी की दर से पत्तिायाँ उत्पन्न होना जारी रहती है।  अवस्था 2 – दोजियाँ निकलना यह अवस्था पहली दोनी के प्रकट होने से लेकर दोजियों की अधिकतम संख्या…

धान की फ़सल में विभिन्न प्रकार के कीट और रोग प्रबंधन के तरीके

मुख्य रोग उपरहार असिचिंत परिस्थिति गहरे पानी वाली परिस्थिति  सफेद रोग (नर्सरी में) भूरा धब्बा जीवाणु झुलसा जीवाणु झुलसा शीथ झुलसा जीवाणु धारी शीथ झुलसा झोका शीथ झुलसा भूरा धब्बा खैरा जीवाणु धारी – – झोका – – खैरा – –   सफेद रोग : पहचान : यह रोग लौह तत्व की अनुपलब्धता के द्वारा नर्सरी में अधिक लगात है। नई पत्ती सफेद रंग की निकलेगी जो कागज के समान पडकर फट जाती है। उपचार : इसके उपचार के लिए प्रति हेक्टर ५ किग्रा० फेरस सल्फेट को २० किग्रा० यूरिया अथवा २.५० किग्रा० बुझे हुए चने को ८०० लीटर/हेक्टर पानी के साथ मिलाकर २-३ द्दिडकाव दिन के अन्तर पर करना चाहिये। पत्तियों का भूरा धब्बा : पहचान : पत्तियों पर गहरे कत्थाई रंग के गोल अथवा अण्डाकार धब्बे पड़ जाते है। जिसका बीच का हिस्सा कुद्द पीलापन लिए हुए कत्थई रंग का होता है। इन धब्बो के चारो तरफ पीला सा घेराव बन जाता है। जो इस रांग का विशेष लक्षण है। उपचार :  1. बोने से पूर्व ३ ग्राम थीरम अथवा ४ ग्राम ट्राइकोडमा बिरिडी प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर लेना चाहियें। 2. खड़ी फसल पर जिंक मैगनीज कार्बामेट या जीरम ८० प्रतिशत का दो किलो…

बेहतर धान की फसल के लिये महत्वपूर्ण मासिक क्रियाकलाप

धान की फसल में महत्वपूर्ण मासिक कार्य बिन्दु मई १ पंत-४ सरजू-५२ आई.आर.-३६ नरेन्द्र ३५९ आदि। २ धान के बीज शोधन बीज को १२ घन्टे पानी मे भिगोकर तथा सुखाकर नर्सरी में बोना। जून १ धान की नर्सरी डालना। सुगन्धित प्रजातियां शीघ्र पकने वाली। २ नर्सरी में खैरा रोग लगने पर जिंक सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव सफेदा रोग हेतु फेरस सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव ३ धान की रोपाई ४ रोपाई के समय संस्तुत उर्वरक का प्रयोग एवं रोपाई के एक सप्ताह के अंदर ब्यूटाक्लोर से खरपतवार नियंत्रण जुलाई  १ धान की रोपाई प्रत्येक वर्गमीटर मे ५० हिल तथा प्रत्येक हिल पर २-३ पौधे लगाना एवं ब्यूटाक्लोर से खरपतवार नियंत्रण २ ऊसर क्षेत्र हेतु ऊसर धान-१ जया साकेत-४ की रोपाई ३५-४० दिन की पौध लगाना। पंक्ति से पंक्ति की दूरी १५ सेमी व पौधे से पौधे की दूरी १० सेमी. एवं एक स्थान पर ४-५ पौध लगाना। अगस्त  १ धान में खैरा रोग नियंत्रण हेतु ५ किग्रा. जिंक सल्फेट तथा २० किग्रा. यूरिया अथवा २.५ किग्रा. बुझा चूना को ८०० लीटर पानी। २ धान में फुदका की रोकथाम हेतु मोनोक्रोटोफास ३५ ई.सी. एक ली. अथवा इंडोसल्फान ३५ ई.सी. १.५ लीटर ८०० लीटर घोलकर प्रति हे. द्दिडकाव। सितम्बार  १ धान…

धान के फ़सल का रोगों और हानिकारक कीटों से बचाव

रोगों और हानिकारक कीटों जीवों का एकीकृत प्रबन्ध 1. सामान्य सावधानियां विषिष्ट क्षेत्रों के लिए प्रतिरोधी और सु-अनुकूलित प्रजातियों का चुनाव कीजिए। स्वच्छ एवं रोगमुक्त बीजों का चुनाव कीजिए। समुचित सस्यीय क्रियाएं, जैसे अनुकूलतम बोआई/रोपाई समय एवं पौद अवस्था, रोपाई ज्यामिति, रोपाई की गहराई आदि। अच्छा जल प्रबंध, उदाहरणार्थ, कीटों एवं रोगो के आक्रमण के समय पर खेत से जल निकाल दीजिए। 2.  खेत की तैयारी : ट्राइकोडर्मा हर्जिएनम या स्यूडोमोनास फ्लुओंरेसेन्स से पूर्व कालोनिकृत गोबर की खाद का प्रयोग कीजिए। गोबर की खाद की के पूर्व-कॉलोनीकरण के लिए गोबर की खाद के गढ्ढे में मासिक अंतराल पर ट्राइकोडर्मा हर्जिएनम/स्यूडोमोनास फ्लुओंरेसेन्स या 1.0 कि0 ग्रा0/गङ्ढा की दर से पंत बायो-एजेन्ट मिलाया जाता हैं। इन गङ्ढों को गले की पत्तियों या धान के पुआल से ढक देना चाहिए। नियमित अंतरालों पर बायो-एजेन्ट प्रयोग के बाद कम से कम एक बार और आर्दता बानाए रखने के लिए गोबर की खाद के प्रयोग से 15 एवं 7 दिन पहले जल का छिड़काव करना चाहिए। हरी खाद फसलों की बोआई करनी चाहिए। हरी खाद फसल के मिट्टी में मिलाने के ठीक समय पर 5 ग्राम प्रत्येक/लीटर जल की दर से ट्राइकोडर्मा हर्जिएनम एवं स्यूडोमोनास फ्लुओंरेसेन्स का छिड़काव कीजिए। 3.   नर्सरी बोआई के समय पर…

बढ़िया पैदावार वाली स्वदेशी चावल की किस्में तथा उपयुक्त कृषि क्षेत्र

उच्च ईकोसैस्टेम में उगाई जाने वाली क्र. संख्या क़िस्में जारी करने का साल जारी करने वाली संस्था तैयार होने की कुल अवधि (दिन) पैदावार क्षमता (टन / हेक्टेयर) 1 बाला 1970 सीवीआरसी 105 – 2 सत्तरि 1980 उड़ीसा / सीवीआरसी 80 3 3 कलिंगा – 3 1983 उड़ीसा 80 3.5 4 नीला 1985 उड़ीसा 90 4 5 अन्नदा 1987 सीवीआरसी / गोवा / उड़ीसा 110 5 6 हीरा 1988/ 1991 उड़ीसा / सीवीआरसी 68 3 7 कल्याणी – 3 1988 उड़ीसा 62 2.5-3.0 8 तारा 1988 उड़ीसा 100 4.5 9 वनप्रभा 1988 उड़ीसा 90 3 10 स्नेहा 1992 उड़ीसा 70 3.5 11 वंदना 1992 बिहार 95 3.5 12 ढला हीरा 1996 उड़ीसा 80 3.5 13 अंजलि 2003 झारखंड / सीवीआरसी 90 3.5 14 सदाबहार 2003 झारखंड 105 3.5 15 हज़ारिधन 2003 झारखंड 120 5 16 वीरेंदर 2006 झारखंड 90 4.5   सिंचित ईकोसैस्टेम में उगाई जाने वाली क्र. संख्या क़िस्म जारी का साल द्वारा जारी कुल अवधि (दिन) पैदावार क्षमता (टन / हेक्टेयर) 1 पद्म 1968 सीवीआरसी 120 – 2 किरण 1970 बिहार / पश्चिम बंगाल 110 4 3 कृष्णा 1970 सीवीआरसी 125 – 4 रत्न 1970 सीवीआरसी 125 5 5 विजया 1970 उत्तर प्रदेश 135 – 6 साकेत – ४…

प्रमुख भारतीय फसलें एवं उनका वर्गीकरण

सामान्तया भारतीय फसलों का वर्गीकरण अनेक बिन्दुओ को ध्यान में रखते हुए कई प्रकार से किया जा सकता है ऋतु आधारित जीवनचक्र आधारित आर्थिक आधारित विशेष उपयोग आधारित 1.     ऋतु आधारित    ख‍रीफ फसलें जून-जुलाई में  बारिश से बुवाई की जाती है  (मानसून की फसल)। सितंबर-अक्टूबर में कटाई की जाती है ऐसी फासले बहुत पानी और गर्म मौसम की मांग करती हैं। उदहारण : धान, बाजरा , मक्‍का, कपास, मूँगफली, शकरकन्‍द, उर्द, मूँग , लोबिया,  ज्‍वार, तिल,  ग्‍वार, जूट, सनई, अरहर,  गन्‍ना, सोयाबीन, भिंण्‍डी रबी फसलें अक्टूबर-नवंबर में बुवाई की जाती है तथा अप्रैल-मई में कटाई बीज के अंकुरण के लिए गर्म जलवायु की आवश्यकता होती है,  विकास और परिपक्वता  के लिए ठंड जलवायु की । उदारहण : गेहूँ, जौं, चना, सरसों, मटर, बरसीम, रिजका, मसूर, आलू, तम्‍बाकू, लाही, जंई जायद फसलें रबी और खरीफ फसल सीजनों के बीच में इन फसलो की बुवाई और कटाई संपन्न की जाती है, मुखयतः मार्च-जून के बीच का समय काल इनका होता है। प्रारंभिक परिपक्व फसलों कद्दू, खरबूजा, तरबूज, लौकी, तोरई, मूँग,  खीरा, मीर्च, टमाटर, सूरजमूखी 2.       जीवनचक्र आधारित फसलें एकवर्षीय फसलें  धान, गेहूँ ,चना, ढैंचा, बाजरा, मूँग,कपास, मूँगफली,सरसों,आलू,शकरकन्‍द,कद्दू,लौकी, सोयाबीन द्विवर्षीय चुक्कन्‍दर, प्‍याज बहूवर्षीय नेपियर घास, रिजका,फलवाली फसलें 3.       आर्थिक आधारित अन्‍न या…
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