धान

धान की फ़सल और उसके बढ़ने की विभिन्न अवस्थाएं

धान का पौध और वृध्दि अवस्थाएं ग्रैमिनी कुल के अन्य एक वर्शी पौधों के समान धान का प्रौधा संयुक्त तना (कल्म के रूप में प्रसिध्द) अधिक सपाट पत्तिायॉ और अंतस्थ पुश्पगुच्छ रखता है। अवस्था 0 – अंकुरण से लेकर निर्गमन तक सामान्यत:  इसके बीज 24 घंटे तक भिगोने और उसके बाद दूसरे 24 घंटे तक ऊश्मायित करके पहले से अंकुरित कर लिए जातें हैं। पूर्व – अंकुरण के बाद मूलांकुर एव प्रांकुर पुश्प से बाहर निकल आते है बीज क्यारी में बोआई के दूसरे या तीसरे दिन तक प्रांकुर चोल से पहलीपत्ती फूटती हैं अवस्था 0 की समाप्ति तक अभी निकली हुई मुड़ी हुई प्राथमिक पत्ती ओर व लंबे मूलांकुर दिखाई देते हैं। अवस्था 1 – बेहन (बोआई) बेहन अवस्था निकलने के ठीक बाद प्रारम्भ होती है। और पहली दोजी प्रकट होने से ठीक पहले तक चलती है। इस अवस्था के दौरान प्रारम्भिक जड़े और 5 पत्तिायों तक उत्पन्न हो जाती हैं। जैसे – जैसे पौध बढ़ना जारी रखती है, दो अधिक पत्तिायाँ विकसित हो जाती है। प्रारम्भिक अवस्था के दौरान प्रत्येक 3-4 दिनों पर 1 पत्ताी की दर से पत्तिायाँ उत्पन्न होना जारी रहती है।  अवस्था 2 – दोजियाँ निकलना यह अवस्था पहली दोनी के प्रकट होने से लेकर दोजियों की अधिकतम संख्या…

धान की फ़सल में विभिन्न प्रकार के कीट और रोग प्रबंधन के तरीके

मुख्य रोग उपरहार असिचिंत परिस्थिति गहरे पानी वाली परिस्थिति  सफेद रोग (नर्सरी में) भूरा धब्बा जीवाणु झुलसा जीवाणु झुलसा शीथ झुलसा जीवाणु धारी शीथ झुलसा झोका शीथ झुलसा भूरा धब्बा खैरा जीवाणु धारी – – झोका – – खैरा – –   सफेद रोग : पहचान : यह रोग लौह तत्व की अनुपलब्धता के द्वारा नर्सरी में अधिक लगात है। नई पत्ती सफेद रंग की निकलेगी जो कागज के समान पडकर फट जाती है। उपचार : इसके उपचार के लिए प्रति हेक्टर ५ किग्रा० फेरस सल्फेट को २० किग्रा० यूरिया अथवा २.५० किग्रा० बुझे हुए चने को ८०० लीटर/हेक्टर पानी के साथ मिलाकर २-३ द्दिडकाव दिन के अन्तर पर करना चाहिये। पत्तियों का भूरा धब्बा : पहचान : पत्तियों पर गहरे कत्थाई रंग के गोल अथवा अण्डाकार धब्बे पड़ जाते है। जिसका बीच का हिस्सा कुद्द पीलापन लिए हुए कत्थई रंग का होता है। इन धब्बो के चारो तरफ पीला सा घेराव बन जाता है। जो इस रांग का विशेष लक्षण है। उपचार :  1. बोने से पूर्व ३ ग्राम थीरम अथवा ४ ग्राम ट्राइकोडमा बिरिडी प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर लेना चाहियें। 2. खड़ी फसल पर जिंक मैगनीज कार्बामेट या जीरम ८० प्रतिशत का दो किलो…

बेहतर धान की फसल के लिये महत्वपूर्ण मासिक क्रियाकलाप

धान की फसल में महत्वपूर्ण मासिक कार्य बिन्दु मई १ पंत-४ सरजू-५२ आई.आर.-३६ नरेन्द्र ३५९ आदि। २ धान के बीज शोधन बीज को १२ घन्टे पानी मे भिगोकर तथा सुखाकर नर्सरी में बोना। जून १ धान की नर्सरी डालना। सुगन्धित प्रजातियां शीघ्र पकने वाली। २ नर्सरी में खैरा रोग लगने पर जिंक सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव सफेदा रोग हेतु फेरस सल्फेट तथा यूरिया का द्दिडकाव ३ धान की रोपाई ४ रोपाई के समय संस्तुत उर्वरक का प्रयोग एवं रोपाई के एक सप्ताह के अंदर ब्यूटाक्लोर से खरपतवार नियंत्रण जुलाई  १ धान की रोपाई प्रत्येक वर्गमीटर मे ५० हिल तथा प्रत्येक हिल पर २-३ पौधे लगाना एवं ब्यूटाक्लोर से खरपतवार नियंत्रण २ ऊसर क्षेत्र हेतु ऊसर धान-१ जया साकेत-४ की रोपाई ३५-४० दिन की पौध लगाना। पंक्ति से पंक्ति की दूरी १५ सेमी व पौधे से पौधे की दूरी १० सेमी. एवं एक स्थान पर ४-५ पौध लगाना। अगस्त  १ धान में खैरा रोग नियंत्रण हेतु ५ किग्रा. जिंक सल्फेट तथा २० किग्रा. यूरिया अथवा २.५ किग्रा. बुझा चूना को ८०० लीटर पानी। २ धान में फुदका की रोकथाम हेतु मोनोक्रोटोफास ३५ ई.सी. एक ली. अथवा इंडोसल्फान ३५ ई.सी. १.५ लीटर ८०० लीटर घोलकर प्रति हे. द्दिडकाव। सितम्बार  १ धान…

धान के फ़सल का रोगों और हानिकारक कीटों से बचाव

रोगों और हानिकारक कीटों जीवों का एकीकृत प्रबन्ध 1. सामान्य सावधानियां विषिष्ट क्षेत्रों के लिए प्रतिरोधी और सु-अनुकूलित प्रजातियों का चुनाव कीजिए। स्वच्छ एवं रोगमुक्त बीजों का चुनाव कीजिए। समुचित सस्यीय क्रियाएं, जैसे अनुकूलतम बोआई/रोपाई समय एवं पौद अवस्था, रोपाई ज्यामिति, रोपाई की गहराई आदि। अच्छा जल प्रबंध, उदाहरणार्थ, कीटों एवं रोगो के आक्रमण के समय पर खेत से जल निकाल दीजिए। 2.  खेत की तैयारी : ट्राइकोडर्मा हर्जिएनम या स्यूडोमोनास फ्लुओंरेसेन्स से पूर्व कालोनिकृत गोबर की खाद का प्रयोग कीजिए। गोबर की खाद की के पूर्व-कॉलोनीकरण के लिए गोबर की खाद के गढ्ढे में मासिक अंतराल पर ट्राइकोडर्मा हर्जिएनम/स्यूडोमोनास फ्लुओंरेसेन्स या 1.0 कि0 ग्रा0/गङ्ढा की दर से पंत बायो-एजेन्ट मिलाया जाता हैं। इन गङ्ढों को गले की पत्तियों या धान के पुआल से ढक देना चाहिए। नियमित अंतरालों पर बायो-एजेन्ट प्रयोग के बाद कम से कम एक बार और आर्दता बानाए रखने के लिए गोबर की खाद के प्रयोग से 15 एवं 7 दिन पहले जल का छिड़काव करना चाहिए। हरी खाद फसलों की बोआई करनी चाहिए। हरी खाद फसल के मिट्टी में मिलाने के ठीक समय पर 5 ग्राम प्रत्येक/लीटर जल की दर से ट्राइकोडर्मा हर्जिएनम एवं स्यूडोमोनास फ्लुओंरेसेन्स का छिड़काव कीजिए। 3.   नर्सरी बोआई के समय पर…

बढ़िया पैदावार वाली स्वदेशी चावल की किस्में तथा उपयुक्त कृषि क्षेत्र

उच्च ईकोसैस्टेम में उगाई जाने वाली क्र. संख्या क़िस्में जारी करने का साल जारी करने वाली संस्था तैयार होने की कुल अवधि (दिन) पैदावार क्षमता (टन / हेक्टेयर) 1 बाला 1970 सीवीआरसी 105 – 2 सत्तरि 1980 उड़ीसा / सीवीआरसी 80 3 3 कलिंगा – 3 1983 उड़ीसा 80 3.5 4 नीला 1985 उड़ीसा 90 4 5 अन्नदा 1987 सीवीआरसी / गोवा / उड़ीसा 110 5 6 हीरा 1988/ 1991 उड़ीसा / सीवीआरसी 68 3 7 कल्याणी – 3 1988 उड़ीसा 62 2.5-3.0 8 तारा 1988 उड़ीसा 100 4.5 9 वनप्रभा 1988 उड़ीसा 90 3 10 स्नेहा 1992 उड़ीसा 70 3.5 11 वंदना 1992 बिहार 95 3.5 12 ढला हीरा 1996 उड़ीसा 80 3.5 13 अंजलि 2003 झारखंड / सीवीआरसी 90 3.5 14 सदाबहार 2003 झारखंड 105 3.5 15 हज़ारिधन 2003 झारखंड 120 5 16 वीरेंदर 2006 झारखंड 90 4.5   सिंचित ईकोसैस्टेम में उगाई जाने वाली क्र. संख्या क़िस्म जारी का साल द्वारा जारी कुल अवधि (दिन) पैदावार क्षमता (टन / हेक्टेयर) 1 पद्म 1968 सीवीआरसी 120 – 2 किरण 1970 बिहार / पश्चिम बंगाल 110 4 3 कृष्णा 1970 सीवीआरसी 125 – 4 रत्न 1970 सीवीआरसी 125 5 5 विजया 1970 उत्तर प्रदेश 135 – 6 साकेत – ४…

धान की उत्तम खेती के तौर-तरीक़े : एक नज़र

धान / चावल के बारे में चावल के खेतों को धान के खेतों के रूप में जाना जाता है । धान गीली, नम जलवायु में उगने वाला, एक उष्णकटिबंधीय पोधा है। सिंचाई के लिए वायुमंडलीय नमी और वर्षा पर निर्भर करता है । इस बात की सबसे अधिक संभावना है कि धान पूर्वी हिमालय की तलहटी में पाई जाने वाली जंगली घासोंके एक वंशज है। एक विचार के अनुसार धान का जन्म दक्षिण भारत में हुआ और बाद में यह देश के उत्तर में फैल गया कर फिर चीन तक पहुँच गया। जापान और इंडोनेशिया में इसका आगमन लगभग 2 000 ई.पू. तो कोरिया , फिलीपींस में लगभग 1000 ई.पू. में माना जाता है। दुनिया भर में चावल की यात्रा धीमी रही है, लेकिन एक बार आने के बाद यह रुक गया और लोगों के लिए एक प्रमुख कृषि और आर्थिक उत्पाद बन गया। भारतीय उपमहाद्वीप में खेती की भूमि के एक चौथाई से अधिक में चावल ( 20011-12 ) बोया जाता है। यह भारत के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में दैनिक भोजन का एक बहुत जरूरी हिस्सा है। उपमहाद्वीप के उत्तरी और मध्य भाग में जहां गेहूं अक्सर खाया जाता है, चावल अपना ही एक खास स्थान रखता है…
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