कृषि प्रबंधन

जनवरी माह के कृषि कार्य

Updated on April 11th, 2018 at 05:19 pm

जनवरी

फसलोत्पादन

गेहूँ 

  • गेहूँ में दूसरी सिंचाई बोआई के 40-45 दिन बाद कल्ले निकलते समय और तीसरी सिंचाई बोआई के 60-65 दिन बाद गांठ बनने की अवस्था पर करें।
  • गेहूँ की फसल को चूहों से बचाने के लिए जिंक फास्फाइड से बने चारे अथवा एल्यूमिनियम फास्फाइड की टिकिया का प्रयोग करें।

जौ 

  • जौ में दूसरी सिंचाई, बोआई के 55-60 दिन बाद गांठ बनने की अवस्था पर करें।

चना 

  • फूल आने के पहले एक सिंचाई अवश्य करें।
  • फसल में उकठा रोग की रोकथाम के लिए बुआई से पूर्व ट्राइकोडरमा 5 किग्रा प्रति हेक्टेयर 60-75 किग्रा सड़ी हुई गोबर की खाद में मिला कर भूमि शोधन करना चाहिये।

मटर

  • मटर में बुकनी रोग (पाउडरी मिल्ड्यू) जिसमें पत्तियों, तनों तथा फलियों पर सफेद चूर्ण सा फैल जाता है, की रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेयर घुलनशील गंधक 80%, 2.0 किग्रा 500 – 600 लीटर पानी में घोलकर 10-12 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।

राई-सरसों 

  • राई-सरसों में दाना भरने की अवस्था में दूसरी सिंचाई करें।
  • माहू कीट पत्ती, तना व फली सहित सम्पूर्ण पौधे से रस चूसता है। इसके नियंत्रण के लिए प्रति हेक्टेयर डाइमेथोएट 30% ई.सी. की 0 लीटर मात्रा 650 – 750 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

शीतकालीन मक्का

  • खेत में दूसरी निराई-गुड़ाई, बोआई के 40-45 दिन बाद करके खरपतवार निकाल दें।
  • मक्का में दूसरी सिंचाई बोआई के 55-60 दिन बाद व तीसरी सिंचाई बोआई के 75-80 दिन बाद करनी चाहिए।

शरदकालीन गन्ना 

  • आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें।
  • गन्ना को विभिन्न प्रकार के तनाछेदक कीटों से बचाने के लिए प्रति हेक्टेयर 30 किग्रा कार्बोफ्युरॉन 3% सी0 जी0 का प्रयोग करें।

बरसीम

  • कटाई व सिंचाई 20-25 दिन के अन्तराल पर करें। प्रत्येक कटाई के बाद भी सिंचाई करें।

सब्जियों की खेती

  • आलू, टमाटर तथा मिर्च में पिछेती झुलसा से बचाव हेतु मैंकोजेब 75% डब्ल्यू. पी. की 2 किग्रा मात्रा प्रतिहेक्टेयर 500-600 ली0 पानी में घोल कर छिड़काव करें।
  • मटर में फूल आते समय हल्की सिंचाई करें। आवश्यकतानुसार दूसरी सिंचाई फलियाँ बनते समय करनी चाहिए।
  • गोभीवर्गीय सब्जियों की फसल में सिंचाई, गुड़ाई तथा मिट्टी चढ़ाने का कार्य करें।
  • टमाटर की ग्रीष्मकालीन फसल के लिए रोपाई कर दें।
  • जायद में मिर्च तथा भिण्डी की फसल के लिए खेत की तैयारी अभी से आरम्भ कर दें।

फलों की खेती

  • बागों की निराई-गुड़ाई एवं सफाई का कार्य करें।
  • आम के नवरोपित एवं अमरूद, पपीता एवं लीची के बागों की सिंचाई करें।
  • आम के भुनगा कीट से बचाव हेतु मोनोक्रोटोफास 36% एस. एल. 5 मिली. प्रतिलीटर पानी की दर से छिड़काव करें।
  • आंवला के बाग में गुड़ाई करें एवं थाले बनायें।
  • आंवला के एक वर्ष के पौधे के लिए 10 किग्रा गोबर/ कम्पोस्ट खाद, 100 ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फास्फेट व 75 ग्राम पोटाश देना आवश्यक होगा। 10 वर्ष या उससे ऊपर के पौधे में यह मात्रा बढ़कर 100 किग्रा गोबर/कम्पोस्ट खाद, 1 किग्रा नाइट्रोजन, 500 ग्राम फास्फेट व 750 ग्राम पोटाश हो जायेगी। उक्त मात्रा से पूरा फास्फोरस, आधी नाइट्रोजन व आधी पोटाश की मात्रा का प्रयोग जनवरी माह से करें।

पुष्प व सगन्ध पौधे

  • गुलाब में समय-समय पर सिंचाई एवं निराई गुड़ाई करें तथा आवश्यकतानुसार बंडिंग व इसके जमीन में लगाने का कार्य कर लें।
  • मेंथा के सकर्स की रोपाई कर दें। एक हेक्टेयर के लिए 5-5.0 कुन्टल सकर्स आवश्यक होगा।

पशुपालन/दुग्ध विकास

  • पशुओं को ठंड से बचायें। उन्हें टाट/बोरे से ढकें। पशुशाला में जलती आग न छोड़ें।
  • पशुशाला में बिछाली को सूखा रखें।
  • पशुओं के भोजन में दाने की मात्रा बढ़ा दें।
  • पशुओं में लीवर फ्लूक नियंत्रण हेतु कृमिनाशक दवा पिलवायें।
  • खुरपका, मुँहपका रोग से बचाव के लिए टीका अवश्य लगवायें।

मुर्गीपालन

  • अण्डे देने वाली मुर्गियों को लेयर फीड दें।
  • चूजों को पर्याप्त रोशनी तथा गर्मी दें।

 

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