खेतीधानफसलें

धान की फ़सल और उसके बढ़ने की विभिन्न अवस्थाएं

धान का पौध और वृध्दि अवस्थाएं

ग्रैमिनी कुल के अन्य एक वर्शी पौधों के समान धान का प्रौधा संयुक्त तना (कल्म के रूप में प्रसिध्द) अधिक सपाट पत्तिायॉ और अंतस्थ पुश्पगुच्छ रखता है।

अवस्था 0 – अंकुरण से लेकर निर्गमन तक

  • सामान्यत:  इसके बीज 24 घंटे तक भिगोने और उसके बाद दूसरे 24 घंटे तक ऊश्मायित करके पहले से अंकुरित कर लिए जातें हैं। पूर्व – अंकुरण के बाद मूलांकुर एव प्रांकुर पुश्प से बाहर निकल आते है
  • बीज क्यारी में बोआई के दूसरे या तीसरे दिन तक प्रांकुर चोल से पहलीपत्ती फूटती हैं अवस्था 0 की समाप्ति तक अभी निकली हुई मुड़ी हुई प्राथमिक पत्ती ओर व लंबे मूलांकुर दिखाई देते हैं।

अवस्था 1 – बेहन (बोआई)

  • बेहन अवस्था निकलने के ठीक बाद प्रारम्भ होती है। और पहली दोजी प्रकट होने से ठीक पहले तक चलती है। इस अवस्था के दौरान प्रारम्भिक जड़े और 5 पत्तिायों तक उत्पन्न हो जाती हैं।
  • जैसे – जैसे पौध बढ़ना जारी रखती है, दो अधिक पत्तिायाँ विकसित हो जाती है। प्रारम्भिक अवस्था के दौरान प्रत्येक 3-4 दिनों पर 1 पत्ताी की दर से पत्तिायाँ उत्पन्न होना जारी रहती है।

 अवस्था 2 – दोजियाँ निकलना

  • यह अवस्था पहली दोनी के प्रकट होने से लेकर दोजियों की अधिकतम संख्या तक पहुँचने तक जारी रहती है।
  • दोजियाँ गॉठो की सहायक कलिकाओं से निकलती है और वे बढ़ते एक विकसित होकर पत्ताी का स्थान ले लेती हैं।
  • यह पौध मुख्य कल्म और इसकी पत्तिायों के संबन्ध में दो प्राथमिक दोजियों की स्थिति प्रदर्षित करती है।
  • बाहर निकलने के बाद प्राथमिक दोजियाँ द्वितीयक दोजियाँ उत्पन्न करती हैं। ऐसी स्थिति रोपाई के लगभग 30 दिन बाद पाई जाती है।
  • पौध इस समय बढ़ रहा होता है और सक्रियतापूर्ण के दोजियाँ उत्पन्न करता है। यहाँ प्रारम्भिक दोजी निकलने की अवस्था पर पौधों से युक्त खेती प्रदर्षित किया गया है। बढ़ी हुईपत्ती उत्पत्ति एवं दोजी विकास के कारण दोजी आकार एवं वितान (कैनोपी) विकास को देखिए।
  • अनेक प्राथमिक एवं द्वितीयक दोजियों के अतिरिक्त पौधे के अधिक लम्बा एवं बड़ा होते ही द्वितीयक दोजियों से नई तृतीयक दोजियाँ निकलती हैं।
  • इस अवस्था तक दोजियाँ उस बिन्दु तक बढ़ चुकी होती है कि मुख्य तने को ढूंढ़ना कठिन हो जाता है। अगली अवस्था अर्थात् तना दीर्घीकरण (लंबा होना) में पौधे के प्रवेष करते ही दोजियाँ लगातार विकसित होनी जारी रखती है।

अवस्था 3 – तना दीर्घीकरण (लंबा होना)

  • यह अवस्था पुश्पगुच्छ षुरूआत से पूर्ण षुरू हो सकती है या यह दोजियाँ निकलने की अवस्था के परवर्ती हिस्से के दौरान पाई जा सकती है। इस प्रकार अवस्थाओं 2 एवं 3 का परस्पर व्यापन हो सकता हैं।
  • पुष्प गुच्छ षुरूआत से पहले षुरू होता है
  • दोजियाँ निकलने की अवस्था से परस्पर व्यापक करता हैदोनियाँ संख्या एवं  ऊँचाई में बढ़ती है
  • दोजियाँ संख्या में एवं ऊँचाई में बढ़ना जारी रखती है ओर पत्तिायों का अच्छा खासा एवं सुस्पश्ट जीर्णता नहीं  दिखाईदेती है। बढ़ते पौधों द्वारा भूमि अच्छादन एवं वितान रचना आगे बढ़ता जाता है। वृध्दि अवधि तना दीर्घीकरण से संबंधित होती है। तना दीर्घीकरण अधिक लम्बी वृध्दि अवधि रखने वाली प्रजातियों में अधिक होता है। इस संबंध में धान की प्रजातियाँ जो 105 – 120 दिनों में परिपक्व होती है और लम्बी अवधि की प्रजातियाँ जो 150 दिनों में परिपक्व होती है।
  • जल्दी परिपक्व होने वाली अर्ध बौनी प्रजाति, जैसे आई आर 64 में उस बिन्दु जहाँ पुश्प गुच्छ निकलती है। के नीचे तने की चौथी पोरी पुश्पगुच्छ की षुरूआत के दिखाई देने से पहले केवल 2 से 4 से0 मी0 तक लम्बी हो जाती है। स्लाइड में पुश्प गुच्छ षुरूआत अवस्था पर चौथी पोरी की लम्बाई प्रदर्षित कर रहे विच्छेदित तने प्रदर्षित किए गए हैं।
  • अल्प अवधि की प्रजातियां (105 – 120 दिनों) में अधिकतम दोनियां निकलना तना दीर्घीकरण और पुश्पगुच्छ की षुरूआत लगभग एक साथ होता है।
  • लंबी अवधि की प्रजातियाों में (150 दिन में) तथा कथित विलंबित वर्धन काल होता है जिसके दौरान अधिकतम दोजिनयाँ निकलती हैं। इस के बाद तना या पोरी दीर्घी करण होता है और अंत में पुश्पगुच्छ षुरूआत होती है।

अवस्था 4 – पुश्पगुच्छ षुरूआत से लेकर बूटिंग तक

  • वर्धमान प्ररोह के सिरे पर पुश्पगुच्छ आद्यक की षुरूआत जनन प्रावस्था के प्रारंभ को चिह्नित करती है। पुश्पगुच्छ आद्यक षुरूआत के लगभग 10 दिन पहले नंगी ऑंख से दिखाई देता है। इस अवस्था पर अंतिमरूप से पुश्पगुच्छ के निकलने से पहले अभी तीन पत्तिायाँ निकलेगी।
  • अल्प अवधि की प्रजातियों में पुश्पगुच्छ0-1.5 कि0 मी0 के सफेद पंखदार षंकु के रूप में दिखाई देता है सबसे पहले यह मुख्य कल्म में और उसके बाद दोजियों में पाया जाता है जहां यह असमान प्रतिरूप में निकलता है। यह तना के विच्छेदन करके देखा जा सकता है। चूँकि पुश्पगुच्छ विकसित होना जारी रखता है। अत: स्पाइकिकर पहचानने योग्य हो जाती है।
  • छोटा पुश्प गुच्छ आकार में बढ़ता है और ध्वण पर्णच्छद के भीतर इसके ऊपर की ओर विस्तार पर्णच्छद उभरा हुआ हो जाता है। ध्वज पर्णच्छद के उभार को बुटिंग कहा जाता है। बूंटिंग अधिकतर सबसे मुख्य कल्म में पाया जाता है।
  • बूटिंग पर, पौधे के आधार परपत्तियां एवं फलन लगने वाली दोजियों की जीर्णता (काल प्रभाव एवं मृत्यु) सुस्पश्ट हो जाती है।

अवस्था 6 पुश्पन

  • यह उस समय आरम्भ होता है जब परागकोष स्पाइकिकर से बाहर निकलते है और उसके बाद निशेचन होता है।
  • पुष्पन पर पुश्पक खुलते है, परागकोष पुंकेसर के लम्बे होने के कारण पुश्प तुशों से बाहर निकलते है और पराग झड़ता है। उसके बाद पुश्पक बंद हो जाता है।
  • पराग स्त्रीकेसर पर गिरते है, इसके फलस्वरूप अंड निशेचित हो जाता है। स्त्रीकेसर पंखदार संरचना होती है जिसके द्वारा अंकुरण षील पराग चित्र में कोल रंग की संरचनाएं की परागनलिका अंडाषय में पहुंचेगी।
  • पुष्पन प्रक्रिया उस समय तक जारी रहती है जब तक कि पुश्प गुच्छ में अधिकांष स्पाइकिकाएं नहीं खिलती हैं। बाएं से दाहिनी ओर यह फ्रेम षीर्श निकलने के पहले दिन के बाद पुश्पक्रम के ऊपरी भाग पर प्रफल्लन, षीर्श निकलने के तीसरे दिन के बाद पुश्प क्रम के निचले तिहाई भाग पर प्रफुल्लन प्रदर्षित करता है।
  • षीर्श निकलने के एक दिन बाद पुश्पन होता है। सामान्यत पुश्पक प्रात: काल खुलते हैं। एक पुश्पक गुच्छ में सभी स्पाईकिकाओं के खुलने में लगभग सात दिन लगता है। पुश्पन पर 3-5 पत्तिायाँ अब भी सक्रिय रहती है
  • पुष्पन के प्रारंभ पर इस धान के पौधे की दोजियाँ की दोजियाँ अलग कर दी गई है। और उन्हें फलने एवं न फलने वाली दोजियों में समूहित किया गया है।

अवस्था 7 – दूधियां दाना अवस्था

  • वृध्दि की अंतिम 3 अवस्थाये7,8 एवं 9 पक्क्न प्रावस्था हैं।
  • इस अवस्था में दाना एक दूधियां सामग्री से भरना षुरू हो जाता हैं। दाना सफेद दूधियां तरल से भरना षुरू हो जाता है जिसे अंगुलियों के बीच दाने को दबाकर निचोड़ा जा सकता है।
  • पुष्प गुच्छ हरा दिखाई देता है और झुकना सुरू हो जाता है। दोजियों के आधार पर जीर्णता आगे बढ़ती है। ध्वज पत्तिायाँ एवं दो निचली पित्तायाँ हरी होती हैं।

अवस्था 8 – दाने की गुम्फावस्था

  • इस अवस्था के दौरान दाने का दुधियां हिस्सा पहले मुलायम गुम्फावस्था में परिवर्तित होता है और बाद मे कठोर गुम्फा वस्था (दो) में बदल जाता है।
  • पुश्पगुच्छ में दाने हरे से पीले रंग में बदलना षुरू करते हैं। दोजियों एवंपत्तियों की जीर्णता सुस्पश्ट हो जाती है।
  • खेत पीला -सा दिखाई देना षुरू करदेता है। जैसे ही पुश्पगुच्छ पीला हो जाता है, प्रत्येक दोजी की अंतिम दो षेशपत्तियां सिरों पर सूखना षुरू कर देती है।
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